Wednesday, January 14, 2009

पिंजर..


मैं होकर भी ख़ुद में अलग ,सब में आम थी
एक नाम होकर भी जैसे बेनाम थी
मैं रहना चाहती थी हर पहचान से परे
कुछ लम्हे जीना चाहती थी शब्द भरे
ऐसा नही था कि मैं बस तन्हा से लम्हे चुनती थी
कभी खामोशी बोलती थी तो उसकी भी सुनती थी
मेरे पास आकर जब भी रोती थी मेरी तन्हाई
उन आसुओं से धुल जाती थी मन की काई
मोती समझकर चुगती थी जिसको जिंदगी फ़कीर सी
रिसती थी जैसे रूह पानी पानी ,पीर सी
पर देखा कठोर होते जा रहे थे मन के दरख्त
और मैं होती जा रही थी ख़ुद के साथ सख्त
धुंधले से पड़ने लगे थे वक्त के मंजर
उतरता जा रहा था जेहन में दर्द का खंजर
भूख से बिलखता जा रहा था मेरा जेहन
और मैं बोने लगी थी प्रीत के बीज से बंजर
मैं चलती जा रही थी मन की मिटटी को आंसुओं से सींच
और जिंदगी की हर आह को,अन्दर ही भींच
सोच तड़प रही थी, बुन रही थी कहर
और मन बनता चला गया ख़ुद ब ख़ुद सवालों का पिंजर

8 comments:

Vinay said...

मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं

-----नयी प्रविष्टि
आपके ब्लॉग का अपना SMS चैनल बनायें
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar said...

Parul ji,
Aur man banta chala gaya khud b khud savalon ka pinjar.Bahut dard chhipa hai in panktiyon men.
Parantu us dard aur bhavnaon ko shabdon men bakhoobee bandha hai apne.Badhai.
Hemant Kumar

रश्मि प्रभा... said...

ऐसा नही था कि मैं बस तन्हा से लम्हे चुनती थी
कभी खामोशी बोलती थी तो उसकी भी सुनती थी
.......
main aapki rachnaaon me kho jaati hun

Udan Tashtari said...

ऐसा नही था कि मैं बस तन्हा से लम्हे चुनती थी
कभी खामोशी बोलती थी तो उसकी भी सुनती थी


--बहुत सुन्दर भाव!! बधाई.

सुशील छौक्कर said...

आज पहली बार आया आपके ब्लोग पर। बहुत अच्छा लगा। सुन्दर भावों से भरी यह रचना पढ़्कर।
ऐसा नही था कि मैं बस तन्हा से लम्हे चुनती थी
कभी खामोशी बोलती थी तो उसकी भी सुनती थी
मेरे पास आकर जब भी रोती थी मेरी तन्हाई
उन आसुओं से धुल जाती थी मन की काई
मोती समझकर चुगती थी जिसको जिंदगी फ़कीर सी
रिसती थी जैसे रूह पानी पानी ,पीर सी

बहुत ही उम्दा।

makrand said...

सोच तड़प रही थी, बुन रही थी कहर
और मन बनता चला गया ख़ुद ब ख़ुद सवालों का पिंजर
bahut khub

पूनम श्रीवास्तव said...

Parul ji,
kafee bhavnatmak abhivyakti hai is kavita men.shubhkamnayen.
Poonam

Anonymous said...

ab likhna chhut sa gaya hai par ye padhne k baad ji ho raha hai ki apni bhavnao ko bhi shabd de doon

bahut sunder