सिरफिरे इश्क़ से कह दो
वस्ल की गलियां सुलगने को है
और आवारा न हो....
मैंने कुछ चाँद लौटा दिए है चुपचाप
नज़्म को गोल करने की गलती
दुबारा न हो..
हरफ़ सुलगते है तो
जल जाते है बेगुनाह से दिल
खताएँ हो तो खूबसूरत
सब्ज़ सी बज़्म
फिर गवारा न हो...
कतरा कतरा सी हो रही है नफ्स
दुआ है फिर से कोई
ख्वाब तुम्हारा न हो..
सफ्हा न सही,अब्र ही सही
मिले दरिया वो,जिसका अब कोई
किनारा न हो...

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