Tuesday, June 8, 2010

चलो रूमानी हो जाएँ :)


आ,दोनों अपनी उँगलियों से पानी को छेड़े
और बैठे बैठे ख़ामोशी को यूँ उधेड़े
कि हर लफ्ज़ खुद में कहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥
आ जिंदगी फिर कभी न ऐसे छलके
हो जाये दोनों यूँ मन से हल्के
हर कतरा जिंदगानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥
इश्क के दो गरम प्याले
बस अब तो हम लबों से लगा ले
कि पीते ही हर एहसास रूहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥
साँसों में घुलते ठंडी हवाओं के झोंकें
दबी हसरतों को मिलते से ये मौके
इस से पहले कि मंज़र आसमानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाये ॥
तुझ मुझे में अब भी है वो बातें
वो सोये से दिन,वो जागी सी रातें
खाते में और एक शाम सुहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

65 comments:

Vinay said...

चलो रूमानी हो जाएँ, बख़ूबी रूमानितयत में सराबोर है यह रूमानी नज़्म!

---
The Vinay Prajapati

vandan gupta said...

वाह वाह वाह …………………बहुत ही रुमानी रचना……………दिल को छू गयी।

adwet said...

बस अब तो हम लबों से लगा ले
कि पीते ही हर एहसास रूहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

Bahut khoob. Vah!!

adwet said...

बस अब तो हम लबों से लगा ले
कि पीते ही हर एहसास रूहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

bahut khoob. Vah!!

माधव( Madhav) said...

सुन्दर रचना

sonal said...

वाह वाह ! पारुल ये मौसम और इतनी रूमानी नज़्म ...असर हो गया जी ... बस हम भी निकलते है मौसम का मज़ा लेने को

नीरज गोस्वामी said...

बाहर छमाछम होती बरसात में आपनी रूमानी रचना ने रंग भर दिया है...बधाई...
नीरज

wordy said...

ohho..beh gaye hum to :)
fantastic job!

आचार्य उदय said...

आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

आचार्य जी

विजयप्रकाश said...

वाह...आपने तो बरसात की बूंदों के नये अर्थ निकाल लिये.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

साँसों में घुलते ठंडी हवाओं के झोंकें
दबी हसरतों को मिलते से ये मौके
इस से पहले कि मंज़र आसमानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाये


बहुत सुन्दर.....हर पंक्ति रूमानी सी

अबयज़ ख़ान said...

पारूल.. बहुत ख़ूबसूरत ही नहीं, लाजवाब है ये.. इसको अल्फ़ाज़ो में बयां करना बेमानी सा है..

kunwarji's said...

"साँसों में घुलते ठंडी हवाओं के झोंकें
दबी हसरतों को मिलते से ये मौके
इस से पहले कि मंज़र आसमानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाये ॥"

bahut badhiya ji...
खामोशियों की जुबाँ समझे तो मायने बदल जाते है बातो के,
असमंजस में है कि बातों के मायने बदले या बात पुरानी रहने दे....

कुंवर जी

Apanatva said...

are wah kya andaz hai.......
mood bana rahe aur aise mood me fatafat do char rachanae aur likh daliye...........
Aabhar

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi said...

रचना बहुत अच्छी लगी..

शिवम् मिश्रा said...

बहुत खूब जी ! लगे रहिये !

Khanna said...

Bahut sundar rachna!

कुश said...

ख़ामोशी का उधड़ना.. ख्याल में चार्म घोलता है..
गुलज़ार साहब का लिखा गीत.. बोल ना हल्के हल्के याद आ रहा है..

संजय भास्‍कर said...

इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

M VERMA said...

खाते में और एक शाम सुहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥
रूमानियत में डूबी सुन्दर रचना

daddudarshan said...

कुदरत में जिन्दगी है ,इसे पास करके देखो |
हर शय में खुशी रोशन, विश्वास करके देखो |
क्यों मातम है मौत का सा पल- पल में तुम्हारे -
ज़र्रे- ज़र्रे में रागिनी है ,एहसास कर के देखो |
और ये एहसास आपकी कविता में बखूबी दिखा है | बहुत खूब | बधाई |

प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh) said...

इश्क के दो गरम प्याले
बस अब तो हम लबों से लगा ले
कि पीते ही हर एहसास रूहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

..अच्छा लिखती हैं आप...

Unknown said...

हिला देना वाली अभिब्यक्ति

प्रिया said...

Wow ....ham to padhkar hi rumaani ho gaye :-)

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

पारुलजी,
मैंने अपने ब्लॉग शस्वरं पर भी अभी दो रूमानी ग़ज़लें लगा रखी हैं …
लेकिन आपके यहां आया तो ख़ुद ब ख़ुद रूमानियत की बारिश में भीग गया जैसे ।
वो एक पुराना गाना है ना
…शिकार करने को आए , शिकार हो' के चले
"चलो रूमानी हो जाएं… … …!"
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

पारुलजी,
मैंने अपने ब्लॉग शस्वरं पर भी अभी दो रूमानी ग़ज़लें लगा रखी हैं …
लेकिन आपके यहां आया तो ख़ुद ब ख़ुद रूमानियत की बारिश में भीग गया जैसे ।
वो एक पुराना गाना है ना
…शिकार करने को आए , शिकार हो' के चले
"चलो रूमानी हो जाएं… … …!"
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

are baap re.....ye kyaa.....in pyaari-pyaari panktiyon ko padhkar to thoda-thoda main bhi rumaani ho chalaa hun....sach.....

vikas prajapati said...

बहुत खूब...रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई |

newschakra said...

रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत अच्छा लिखती हैं आप...बहुत बहुत बधाई |

Parul kanani said...

aap sabhi ka aabhar :)

कुमार संभव said...

पारुल जी एक हलचल सी मच गई है .............. बेहतरीन लिखा है आपने ..........

दिनेश शर्मा said...

भावपूर्ण रचना ।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

शानदार रचना, मार्मिक प्रस्तुति।
--------
ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

Anonymous said...

very romantic!

vedvyathit said...

"pite hi hr swansh ruhani ho jaye
ati sudr pnkti
rchna me vstu prignn saili ka sundr pryog hai
sadhrnikrn hetu upadano ka achchha pryog hai
badhai
dr. ved vyathit
email :dr.vedvyathit@gmail.com

Vandana Singh said...

behad khoobsooratttt ..hatts offfff

वीरेंद्र सिंह said...

Wah..Wah..Wah...Just amaging...marvellous. Parul ji aapne bahut... .bahut....achha likhaa hai. I went through it many times.

हरकीरत ' हीर' said...

आ,दोनों अपनी उँगलियों से पानी को छेड़े
और बैठे बैठे ख़ामोशी को यूँ उधेड़े
कि हर लफ्ज़ खुद में कहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

रोमानियत से भरपूर बेहद खूबसूरत नज़्म .....!!

Dr.Ajmal Khan said...

aik bhiina bhiina sa ahsaas dil mein jagatii hai aap ki ye nazm
,bahut khoobsoorat hai ye ahsas...

sheetal said...

bahut khub,

पूनम श्रीवास्तव said...

बहुत सुन्दर----खूबसूरत अनुभूतियों का सुन्दर कोलाज्।

SomeOne said...

बहुत खूब !

के सी said...

कविताएं नियमित रूप से पढ़ता हूँ. इनका शिल्प और कथ्य मुझे बहुत ख़ास लगता है जाने किसकी याद दिलाता है. हो सकता है ये ही खूबी हो कवि की, उसकी कविता कुछ याद दिलाये और फिर पाठक को लगे कि ये उसकी अपनी है. शुभकामनाएं

sanu shukla said...

bahut sundar...umda.

http://iisanuii.blogspot.com/2010/06/blog-post_12.html

Aseem said...

bahut acchi rachna...badhai

स्वप्निल तिवारी said...

mor pankhi jaisi mulayam rachana....abhi barish hogi to shayad pankh fauila ke nachane bhi lagegi ..b'ful......

आचार्य उदय said...

प्रभावशाली लेखन।

Shabad shabad said...

रचना अच्छी लगी...
वाह जी वाह

Avinash Chandra said...

khubsurat rachna ke liye badhai

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar said...

सुन्दर और कोमल भवनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति।

छत्तीसगढ़ पोस्ट said...

वाकई, हर पंक्ति दिल को छू लेने वाली है.. अच्छी प्रस्तुति .... बधाई.....शुक्रिया..

Shayar Ashok : Assistant manager (Central Bank) said...

पारुल जी, सबसे पहले ब्लॉग पर आने का शुक्रिया !!!

आ,दोनों अपनी उँगलियों से पानी को छेड़े
और बैठे बैठे ख़ामोशी को यूँ उधेड़े
कि हर लफ्ज़ खुद में कहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥

बहुत खुबसूरत... लाज़वाब ...

hem pandey said...

खाते में और एक शाम सुहानी हो जाये

- जिन्दगी जीने का यही सही तरीका है.छोटे छोटे सुख जीवन को सुहाना बनाते हैं.

Rajnish tripathi said...

मौसम के मिज़ाज पे अच्छा लिखा है। अच्छी सुखनवर है आप...

हो के आशिक वो परिरुख और नाजुक बन गया
रंग खुलता जाएं है जितना कि उड़ता जाएं हा
रजनीश
wwwkufraraja.blogspot.com

VIVEK VK JAIN said...

bahut sunder poem.....
http://www.anaugustborn.blogspot.com/

VIVEK VK JAIN said...

कि पीते ही हर एहसास रूहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥
awesome.......

Apanatva said...

Parul tumhara rumaneepan me kho jana kuch jyada lamba nahee ho gaya?
blog jagat ko mahanga pad raha hai......

:) :)

Anonymous said...

achchii kavitaaen likhati hain aap..............

स्वाति said...

सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति।

Anonymous said...

रूमानी जज्बों की शानदार अभिव्यक्ति।
---------
क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

पंकज मिश्रा said...

अच्छी रचना बल्कि बहुत ही अच्छी रचना। मेरी शुभकामनाएं। उम्मीद है आप बहुत आगे जाएंगी। रचना के विषय में बहुत कुछ लिखा जा चुका है बस इतना ही कहूंगा कि बहुत शानदार है। आपको बधाई।

दीपक 'मशाल' said...

कोई शक नहीं कि इसे पढ़कर सख्तदिल भी रूमानी हो जायेंगे..

tapish kumar singh 'tapish' said...

bahut gazab likhti hai aap
me to fan ho gaya apka

kumar zahid said...

1
आ,दोनों अपनी उँगलियों से पानी को छेड़े
और बैठे बैठे ख़ामोशी को यूँ उधेड़े
कि हर लफ्ज़ खुद में कहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ ॥
2
इश्क के दो गरम प्याले
बस अब तो हम लबों से लगा ले
कि पीते ही हर एहसास रूहानी हो जाये
3
साँसों में घुलते ठंडी हवाओं के झोंकें
दबी हसरतों को मिलते से ये मौके
इस से पहले कि मंज़र आसमानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाये ॥

Kya baat hai, aap to behad roommani ho gayeen--jaadoo karti hai aapkei lafzo ki yeh kaseedakari--
lagta ab muamlah ulat jayega...ustadi ka..

nahin, seriously, apki nakkasi dil tak utar gayee.

manju mishra said...

...अपनी उँगलियों से पानी को छेड़े
और बैठे बैठे ख़ामोशी को यूँ उधेड़े
कि हर लफ्ज़ खुद में कहानी हो जाये
इन बूंदों की गिरफ्त में चलो रूमानी हो जाएँ

Beautiful.... specially "ख़ामोशी को यूँ उधेड़े कि हर लफ्ज़ खुद में कहानी हो जाये" too good...