Wednesday, March 26, 2014

बिगड़ जाएँ....






यही है चाह
ख़ामोशी टेढ़ा मुंह कर ले
और बातें बिगड़ जाएँ !!
ख्वाब इतने हो बेशक्ल
कि रातें बिगड़ जाएँ !!
दिल पत्थर हो जाएँ
और आईने टूटे
हो अपने ही गुनहगार
खुद को इतना लूटे
चोट ऐसी हो इश्क़ की
कि बरसातें बिगड़ जाएँ !!
चाँद सिले कतरों से 
और यूँ ही फट जाये
और एक तू भी
इधर-उधर कहीं से कट जाये
तन्हाई के कुछ पैबंद
टांक दूं लम्हों पर इस तरह
हिसाब में इश्क़ के
ज़िन्दगी के खाते बिगड़ जाएँ !!


Friday, February 7, 2014

सुनो तुम !!



सुनो तुम
रख दो खुद को
यहीं-कहीं
मैं ढूंढ ही लूँगा
फुर्सत में !!
मैं जब कभी
खुद को कुरेदूंगा
तन्हाई से कह दूंगा
तुम्हे भी भेज दे
ख़ामोशी मेरी
गुमनाम से ख़त में !!
मैं देखूंगा
गर नींद जल्दी जगी
उसे फिर किसी
ख्वाब की तलब लगी
कहीं से तुमको ले आये
इश्क़ की सोहबत में !!
मैं खुद कुछ
मीठा रहूँगा
तुम्हे नमकीन कहूंगा
ज़िन्दगी की लज़्ज़त में !!
तुम मेरी
कोई भूल रखना
या कि याद का फूल रखना
अपने हँसने की आदत में !!




Saturday, January 18, 2014

तू!!


नहीं भूला हूँ अभी तेरे-मेरे
हिस्सों के क़िस्से
तेरी एक धूप  होती थी
मेरी एक छाँव  होती थी!!
हंसी के उस मुहाने पर
नदी जैसे तू मुड़ती थी
तेरा अम्बर नुकीला था
उलझकर ही तू उड़ती थी
जहाँ होता था मेरा पेंच
तू नगें पाँव होती थी!!
नींद के उस कोने पर
बड़ी सिन्दूरी लगती थी
इश्क़ तो सोया होता था
न जाने क्यों तू जगती थी 
अपनी ऐसी ही बारिश में
तू खुद ही नाव होती थी!!
अपनी तन्हाई से लगभग
हौले-हौले सरकती थी
जब भी मन खाली होता था
तभी तू ज्यादा थकती थी
खुद के सिरफ़िरे से ख्वाब का
मुकर्रर दांव होती थी!!






Wednesday, January 8, 2014

तरकीब!!



मैं  जिंदगी की कोई तरकीब लिए था
था कुछ तो ऐसा, जो मैं अजीब लिए था !
एक शहर कुछ गोल सा
बस गया था मुझ में
या कि इश्क़ में मैं
चाँद को रकीब लिए था ! 
समंदर अब भी था
धूप की मुँडेर पर
और मैं खुद को
खुद के करीब लिए था !
कुछ आयतें लिख आया था
उसके दरीचे पर
नींद में भी जैसे
वही तहज़ीब लिए था !
मैं बीत जाऊँ या कि तुम गुज़र जाओ
दिल में न ऐसी कोई
चीज़ लिया था !
कुछ मज़हबी मौसम
फाख्ता से होने लगे जब
दामन में एक बस तेरी
तस्वीर लिए था !!
  

Saturday, September 28, 2013

हाँ कुछ....


वो कुछ खामोशी के टुकड़े
पड़े है इस तरह उखड़े
कहानी एक सदी सी है

ज़ुबान जैसे नदी सी है!
यूँ ही बनती-बिगड़ती है
कभी जो दिल पे पड़ती है
कहीं आढी-कहीं टेढ़ी
चलो कुछ जिंदगी सी है !
तिकोने दिन बरसते है
उन्ही बातों पे हंसते है
कि जिनमें बेरूख़ी सी है
हाँ कुछ बेखुदी सी है!
वो हिस्से भी सुनहरे है
जो हम दोनो ने पहरे है
नही यूँ ही चमकते है
दिलों में रोशनी सी है!

Friday, September 20, 2013

रोज़!!



तुम रोज़ के रोज़ वही होकर के
खफा करते हो
क्यों बदलते नही?
वही होकर के भी क्या करते हो!
बस बार बार ये कहना कि
तुम नई लगो
इसका कोई फ़र्क नही
कि ग़लत लगो या सही लगो
मुझसे शिकवा ही तुम बेवजह करते हो !
ये कैसी ज़िद है तुम्हारी
मैं अपना वजूद उतार दूँ
खुद से ही अजनबी होकर के
मैं तुमको प्यार दूँ
मेरी एक ना पे तुम अपनी
'हाँ' की रज़ा करते हो !

क्या मायने नही रखता
हमारा साथ होना
क्यों ज़रूरी है?
दूर रहकर रोज़ मुलाकात होना
बेमतलब ही तुम इश्क़ को सज़ा करते हो !
छोड़ देते हो अपने वादे
बेज़ुबान चाँद पर
एक ज़िंदगी सा
इंतज़ार सांझ पर
दफ़न होकर के रह जाती हूँ
तुम में ही कहीं
रफू,तुम रोज़ ही
खामोशी की सबा करते हो !

Friday, July 5, 2013

*कनानी* (हैप्पी बर्थडे)




ओ रूई सी
छुईमुई सी
जब भी तू हँसती है!
एक नदी सी
बनती-बिगड़ी सी
मुझ में आ बसती है !!
उल्टी-सीधी सी
एक परिधि सी
जब भी मुड़ती है !
इधर से उधर से
जाने किधर से
मुझ में आ जुड़ती है!
एक परी सी
मुझसे भरी सी
प्यारी सी कश्ती है!!
बातों के कटोरे में
मन यूँ खनकता है
नींद के धागों में
चाँद भी उलझता है
मेरी रूह भी कहीं
तुझमें ही फँसती है!!
बारिशों का एक
छोटा सा दरिया है
यूँ भीग जाने का
मासूम ज़रिया है
कोई हँसी तेरी
जब यूँ ही बरसती है!!
हूक से भरे
शब्दों के दोने है
आढे -तिरछे से
मन के खिलोने है
यूँ ही नही तुझको
मेरी जिंदगी तरसती है!!
मेरे मौसम की
तू कच्ची सी कैरी है
जो आज मैने
तेरी हर ज़िद पहरी है
तेरा बचपन महँगा है
मेरी उम्र सस्ती है!!

Friday, May 31, 2013

कुछ..!



कुछ आढे-तिरछे दिनों का
यूँ तितर-बितर होना !
वो तेरी मासूम गिनती में
फिर से चाँद का 'सिफ़र' होना!
सोचता हूँ कुछ रोज़ के कलमे
तेरे चेहरे पे गढ़ दूँ
नही अच्छा, इबादत में
किसी मजहब का डर होना!
वो कुछ धूप के किस्से
वो कुछ छाँव के हिस्से
कहाँ होता है इस तरह
ख़त जिंदगी का,मयस्सर होना!
वो कतरी नींद के छिलके
वो अनमने से बुलबुले दिल के
बहुत ही शोर करता है
तुझमें शहर होना!
वो फिर से आँखों में फैले
ऐसी इक रात से पहले
रोक सकता है भला कौन
तन्हाई का बहर होना!
नज़्म अब हूक भरती है
सुना है इश्क करती है
बड़ा पेचीदा सा अफसाना है
लफ़्ज़ों की उमर होना!



Saturday, May 11, 2013

डेढ़ इश्क़!

 तभी था ठीक,जब वो मौसमों को दिल में रखता था
डर सा लगता था ,जब कभी वो बारिश को बकता था !!
सुर्ख़ करके हरेक शाम, जो वो भरता था अपना ज़ाम
ख़्वाबों का नशेड़ी था ,कहाँ रातों से छकता था!
सुबह जो देख लेता था, दिल अपना सेक लेता था
सुनहरे लिबास में इश्क उसका खूब फबता था!
यूँ तो कोरी सी हवा थी,मगर उसकी तो दवा थी
ज़र्रे-ज़र्रे में जैसे बस एक वही महकता था !
रोज़ के चाँद गिनता था और चुपके से बीनता था
फिर आदतन खुश्क अम्बर को हँस करके तकता था!
लफंगे कूचे थे कहीं, लुच्ची गलियाँ थी कहीं
डेढ़ से इश्क़ में ,पगली सी फिजाएं भी चखता था!