
कोई आंसूं पूंछें मेरे,कोई लगे दर्द सहलाने
कोई मुझे ख़ुद सा समझें और लगे चाहने
ऐसा ही कोई अपना सा ढूँढता फिरता हूँ
जो सिखा दे जीना,इस जिंदगी के बहाने ....
अब नही भाते रेत में से चमकते मोती
काश इतनी ही कदर इन आंसूओं की होती
न प्यासा सा यूं ही रह जाता मन
सपने हो जाते वक्त से पहले ही सयाने ...
मेरी,मुझसे ही अगर बात करता कोई
झूठे ख्वाबों में न बरबाद रात करता कोई
मैं जाग जाता एक नई सुबह से पहले
और समझ जाता ख़ुद के होने के मायने ...
मैं क्यों समझा नही,डरता रहा पानी से
क्यों उबर पाया नही,गम की जिंदगानी से
काश एक बार उतर जाता इस समन्दर में
तो शायद लगते ये नमकीन आंसूं भी भाने ...
ऐ जिंदगी!आख़िर तू नमकीन कब नही?
मेरे लिए तो तू बेरंग सी अब नही
धीरे धीरे रंग घुल रहे है वजूद में
दिख रहे है चमकते से फलक के शामियाने ...







