Tuesday, August 18, 2009

शामियाने!


कोई आंसूं पूंछें मेरे,कोई लगे दर्द सहलाने
कोई मुझे ख़ुद सा समझें और लगे चाहने
ऐसा ही कोई अपना सा ढूँढता फिरता हूँ
जो सिखा दे जीना,इस जिंदगी के बहाने ....
अब नही भाते रेत में से चमकते मोती
काश इतनी ही कदर इन आंसूओं की होती
न प्यासा सा यूं ही रह जाता मन
सपने हो जाते वक्त से पहले ही सयाने ...
मेरी,मुझसे ही अगर बात करता कोई
झूठे ख्वाबों में न बरबाद रात करता कोई
मैं जाग जाता एक नई सुबह से पहले
और समझ जाता ख़ुद के होने के मायने ...
मैं क्यों समझा नही,डरता रहा पानी से
क्यों उबर पाया नही,गम की जिंदगानी से
काश एक बार उतर जाता इस समन्दर में
तो शायद लगते ये नमकीन आंसूं भी भाने ...
ऐ जिंदगी!आख़िर तू नमकीन कब नही?
मेरे लिए तो तू बेरंग सी अब नही
धीरे धीरे रंग घुल रहे है वजूद में
दिख रहे है चमकते से फलक के शामियाने ...

Monday, August 10, 2009

दौर..


वो दौर कुछ अलग भी था
मेरे पास तुम न थे मगर और सब भी था ॥
जो तुम मिले तो जैसे वो सब खत्म हो गया
तुम ज्यादा हो गए बाकी कम हो गया
अब हाल है ये जिंदगी में बस तुम ही रह गए
एक दौर था वो जब जिंदगी का और कोई मतलब भी था॥
मन्दिर की पूजा याद थी,मस्जिद की इबादत याद थी
ये जिंदगी मेरी तब उस खुदा के बाद थी
तुम क्या मिले कि दिल की इबारत बदल गई
आज इश्क ही खुदा मेरा,तब और कोई मजहब भी था॥
तारों से जगमगाते थे तब सूनी रातों के दीये
मैं ख़ुद में ही रहता था बस अपने सपनों को लिए
तुम क्या मिले जैसे मैंने वो सारे सपने खो दिए
एक ख्वाब मिला तुमसे नया,जहाँ तेरे होने का सबब भी था॥

Friday, August 7, 2009

हो सके तो.........


जो ख्वाब देखा था अक्सर
भर लिया था जीवन में ।
हर तरफ़ बह रहा था जैसे
बस तू ही मन में ।
आज चुभा कोई लम्हा
और तू फिर भर आया है ।
आंखों के सामने तो बस
धुँआ ही छाया है ।
जब भी होता है ऐसा
तू ही मन से रिसता है ।
ये इन आंखों का
इस ख्वाब से कैसा रिश्ता है ?
ये रिश्ता ख्वाब से है
या कि उस धुंधलेपन से,
जो आंखों में भर रहा है
पूछती हूँ बस मन से ।
मेरे मन ने आज
फिर से मुझे समझाया है ।
ये धुंआ है इस लिए
कि शायद कोई ख्वाब फिर सुलग आया है ।
अगर कोई ख्वाब मेरा
फिर से जला रहे हो तुम ।
इतना है बस इस धुएं में
खोए से नज़र आ रहे हो तुम ।
हो सके तो ख़ुद को,मुझको
या कि सब कुछ सुलगा दो ।
और तुम्हारे पास मेरा जो भी है
सब जला दो
सब कुछ जला दो.....

Thursday, August 6, 2009

चाह!


तेरे एहसास भर से
एक दर्द उभर जाता है !!
सोचती हूँ तुझे तो
जैसे मन भर जाता है !!
भूल पाऊँ अगर तो
सब कुछ भुलाना चाहूं !
मैं बिन तेरे
हर हाल में मुस्कुराना चाहूं !
पर जो सुकूं दे
वो एहसास ही मर जाता है!!
तू कोई वादा न कर
तू निभा न पायेगा !
फिर ये दिल रोयेगा
और तू हंसा न पायेगा !
सोच हर आँसू जैसे
ख़ुद में सिहर जाता है !!
तेरी दुनिया में
मेरे होने का एहसास कहाँ ?
हैं तेरे पास सभी
पर तू मेरे पास कहाँ ?
ऐसे ही कुछ सवालों से
मेरा वजूद बिखर जाता है !!
आज बिछडे भी हो
पर शायद फिर कभी संग होंगें !
इस कोरेपन में
छिटके से मेरे रंग होंगें !
इसी ख्वाहिश को जिये
वक्त गुजर जाता है !!

Thursday, July 30, 2009

जा!


जिंदगी के सीने में खंजर चला के जा
जाना हो जहाँ जा,मगर ख़ुद को बता के जा
किस किस से पूछेंगें ,आख़िर कहाँ है तू
कि खोने से पहले ही ख़ुद को पा के जा
होगा जहाँ बसेरा,तेरा भी वहीं डेरा
पर जाने से पहले तू ,मुझ तक तो के जा
तन्हा से होंगें आँसू ,मेरे पास छोड़ जा इन्हे
मेरे लिए ही सही,तू मुस्कुरा के जा
कुछ ख्वाब यूं भी तेरे, तुझको वहां घेरे
अच्छा है तू इनको यहीं सुला के जा
ये मन तेरा,मेरे ही आस-पास होगा
बेहतर है तू कुछ भी मुझसे छुपा के जा
ये गम बिछड़ने का कहीं बोझ बन जाए
जाने से पहले मुझको जी भर रुला के जा
अब तक तो जिंदगी ने मुझको नही अपनाया
आख़िर तू तो मुझको गले लगा के जा
शायद मैं ही तुझको अब तक समझ पाया
इसलिए तू अब मुझको और समझा के जा
कहते कहते थक जाए कहीं ये खामोशी
तू मुझको यूं ही लफ्जों में उलझा के जा
मैं तन्हा रह जाउं अपनी ही तन्हाई में
तू तेरी तन्हाई से मुझको मिला के जा
शायद बिन तेरे ,मैं,मैं रह जाउं
बस यही आख़िर गुजारिश,ख़ुद को मुझे में बसा के जा







अस्तित्व !


कुरेदती जा रही थी मिटटी
ख़ुद को पाने की भूल में ॥
कुछ भी तो हाथ न आया
जिंदगी की धूल में ॥
कुछ एहसास लपककर
गोद में सो गए थककर
और मैं जागती रही
आख़िर यूं ही फिजूल में॥
जिंदगी खलती चली गई
मैं बस चलती चली गई
वो मेरे जेहन तक चुभा
अपना रंग ढूंढती रही
जाने क्यों उस शूल में॥
सूखी आंखों के मोती थे
या अंधेरों की पोथी थे
मैं चाहकर भी न पढ़ पाई
क्या था अस्तित्व के मूल में?

Sunday, July 19, 2009

बाकी है!


जागे हो तुम ,सोये नही और कहते हो रोये नही
ऐसा क्यों लगता है जैसे अभी होनी और बरसात बाकी है
ख्वाबों को और डूबना है अभी
कि अभी तो आधी रात बाकी है॥
ऐसा न हो आँसू में चुपके से कोई ख्वाब सरकने लगे
और आँखें उसे ढूंढते ढूंढते यूं भी थकने लगे
लम्हा कोई नमकीन सा,जिंदगी की मिठास में पनपने लगे
अब दर्द से और कौन सी कहनी बात बाकी है?
रूठी सी खामोशियों को अभी मनाकर आया हूँ मैं
और रूठे से लफ्जों को अभी सुलाकर आया हूँ मैं
चलने दे जब तलक चलता है आंखों से आंखों का सिलसिला
अभी तो कहने सुनने को जिंदगी भर की बात बाकी है॥
मैंने तेरे, जिंदगी को लिखे आज सरे ख़त पढ़े
और मुझको मिले तेरे तन्हा से लम्हे बड़े
जो शायद आज तक थे तेरे मेरे दरम्यान खड़े
पर अब यकीं रखता हूँ मैं कि हमारा साथ बाकी है॥

Wednesday, July 15, 2009

और..


मुझको मालूम होता अगर,अपना ठिकाना
तो मैं ढूंढता फिरता न यूं ही सारा ज़माना
मेरी मुश्किल है यही कि मैं अब तलक ख़ुद तक भी नही
तुमसे मिलकर अब हो गया और नामुकिन ख़ुद तक पहुँच पाना !!
मैं आज लिखने बैठा था जिंदगी को ख़त
कि बनती जा रही हो आख़िर क्यों तुम मेरी उल्फत
ऐ जिंदगी!ख़बर नही,तुझसे मेरा वास्ता है क्या?
फिर भी आज मैं चला निभाने क्यों एक रिश्ता अनजाना !!
खफा खफा सा हूँ तुझसे न जाने किस बात पर
दिन की उजली सी धूप पर या कि चांदनी में धुली रात पर
जिनके होने न होने का मुझ पर फर्क नही
क्यों चाहता हूँ उन्ही ख्वाबों में लौट जाना!!
मैं समझता हूँ तुझ से मुझ तक है बस ये कहानी
हाँ,कभी कभी आ जाता है इसमें पानी
तब और महसूस करता हूँ प्यासी सी जिंदगानी
और अच्छा लगता है इसमें बह जाना!!
जब कभी मैं इस समन्दर से निकलता हूँ
और फिर दो कदम यूं ही तेरे साथ चलता हूँ
कहना चाहता हूँ कुछ,तेरी खामोशी में डूबकर
और होता है बस यूं ही चुप रह जाना!!
मैं खोजने तो निकला था अपना ही सबब
पर समझ न चाहता हूँ अब पहले तेरा ही मतलब
आख़िर समझें एक दूसरे को हम न जाने कब?
जब कि तुझको पाना ही हो शायद ख़ुद को पाना!!

Friday, July 10, 2009

रुखी जिंदगी!


ये आसमां क्यों टूटकर बिखरने को है ?
ये जमीं क्यों आसूँओं से भरने को है ?
सिली सिली सी आख़िर क्यों है हवा ?
क्यों सैलाब दिल में उमड़ने को है ?
मोम सा सितारा,चांदनी में था पल रहा
आज क्यों इस तरह से पिघल रहा
आख़िर किसकी लौ में है जल रहा ?
चाँद भी समन्दर में उतरने को है॥
कशमकश में हर रात जागी सी है
नींद ख्वाबों की भी दूर भागी सी है
क्यों होंठ सिलते है जा रहे
और खामोशी बेचैन, बात करने को है॥
क्या हुआ,जो इस तरह सब के सब रो दिए
किस तरह हमने जिंदगी के मायने खो दिए
जी रहे है आख़िर,किस जज्बात से
जब की हर ख्वाहिश यूं भी मरने को है॥
किसी कोने में बिलखती रूह प्यासी सी है ?
जिंदगी टुकडों में बासी सी है
हाँ! जिंदगी की भूख जरासी सी है
रुखी रोटी सी चाह अभी सिकने को है॥