
वो दौर कुछ अलग भी था
मेरे पास तुम न थे मगर और सब भी था ॥
जो तुम मिले तो जैसे वो सब खत्म हो गया
तुम ज्यादा हो गए बाकी कम हो गया
अब हाल है ये जिंदगी में बस तुम ही रह गए
एक दौर था वो जब जिंदगी का और कोई मतलब भी था॥
मन्दिर की पूजा याद थी,मस्जिद की इबादत याद थी
ये जिंदगी मेरी तब उस खुदा के बाद थी
तुम क्या मिले कि दिल की इबारत बदल गई
आज इश्क ही खुदा मेरा,तब और कोई मजहब भी था॥
तारों से जगमगाते थे तब सूनी रातों के दीये
मैं ख़ुद में ही रहता था बस अपने सपनों को लिए
तुम क्या मिले जैसे मैंने वो सारे सपने खो दिए
एक ख्वाब मिला तुमसे नया,जहाँ तेरे होने का सबब भी था॥







