मैं चुप हूँ
हाथों में सुनहरी धूप मलने तक
और फिर ऐसे ही
उस कोरे से चाँद के जलने तक !!
मुझे मालूम है
तुम यूँ ही नहीं लौट जाओगे
कुछ तो रह जाओगे यहीं
यादों के खलने तक !!
अच्छे भी लगोगे शायद
कुछ हरे होकर
थोड़ी सी जिंदगी
से भरे होकर
टूट जायेंगें खिलोने मगर
तुम्हारा मन बहलने तक !!
इतना तो है कि
इश्क अब खुरदुरा होगा
चुभेगा टीस सा
इस से ज्यादा क्या बुरा होगा
लौट पाऊँगी नहीं मैं
खुद में,तुम्हारे निकलने तक !!
ख़त के लिफ़ाफे भी कि
जैसे हो गए खंडहर
ख़ामोशी अक्सर ही
मचाती है लफ़्ज़ों का बवंडर
यही रुक जाओ बस अब
इश्क का मतलब बदलने तक !!
हाथों में सुनहरी धूप मलने तक
और फिर ऐसे ही
उस कोरे से चाँद के जलने तक !!
मुझे मालूम है
तुम यूँ ही नहीं लौट जाओगे
कुछ तो रह जाओगे यहीं
यादों के खलने तक !!
अच्छे भी लगोगे शायद
कुछ हरे होकर
थोड़ी सी जिंदगी
से भरे होकर
टूट जायेंगें खिलोने मगर
तुम्हारा मन बहलने तक !!
इतना तो है कि
इश्क अब खुरदुरा होगा
चुभेगा टीस सा
इस से ज्यादा क्या बुरा होगा
लौट पाऊँगी नहीं मैं
खुद में,तुम्हारे निकलने तक !!
ख़त के लिफ़ाफे भी कि
जैसे हो गए खंडहर
ख़ामोशी अक्सर ही
मचाती है लफ़्ज़ों का बवंडर
यही रुक जाओ बस अब
इश्क का मतलब बदलने तक !!








