वो एक 'उफ़' की आदत
और उस 'आह' का होना
वो मेरा बेतरकीब सा इश्क
और तेरी अनकही 'चाह' का होना !
वो खाली खाली से तेरे इश्क के साँचे
वो मेरे बेडोल से ख़्वाबों के खांचे
जिंदगी सा भी तो कुछ हों पाया नहीं फिट
और उस पर ख़ामोशी की स्याह का होना !
वो छितरे से आंसू और फटी सी हंसी
जिसमें दोनों की तन्हाई बरबस ही आ फंसी
सोचता हूँ किसी रोज की धूप लगा दूं
न जाने कब तक मयस्सर है सुबह का होना!
वो एक रोज के 'तुम' ,जो कहीं तो थे भर गए
छिला जो आइना तो हर तरफ तुम ही बिखर गए
देखता रहा खुद को और यही सोचता रहा
क्या जरुरी है जवाब में किसी 'वजह' का होना ?
मुझे अक्सर ही अक्स में नज़र आते हैं 'घेरे'
कभी 'शून्य ' भी तो हो सकते है 'फेरे'
फिर मैं क्यों अब तलक सोच से उलझ रहा हूँ ?
और अच्छा नहीं है 'खामखाह ' का होना!
और उस 'आह' का होना
वो मेरा बेतरकीब सा इश्क
और तेरी अनकही 'चाह' का होना !
वो खाली खाली से तेरे इश्क के साँचे
वो मेरे बेडोल से ख़्वाबों के खांचे
जिंदगी सा भी तो कुछ हों पाया नहीं फिट
और उस पर ख़ामोशी की स्याह का होना !
वो छितरे से आंसू और फटी सी हंसी
जिसमें दोनों की तन्हाई बरबस ही आ फंसी
सोचता हूँ किसी रोज की धूप लगा दूं
न जाने कब तक मयस्सर है सुबह का होना!
वो एक रोज के 'तुम' ,जो कहीं तो थे भर गए
छिला जो आइना तो हर तरफ तुम ही बिखर गए
देखता रहा खुद को और यही सोचता रहा
क्या जरुरी है जवाब में किसी 'वजह' का होना ?
मुझे अक्सर ही अक्स में नज़र आते हैं 'घेरे'
कभी 'शून्य ' भी तो हो सकते है 'फेरे'
फिर मैं क्यों अब तलक सोच से उलझ रहा हूँ ?
और अच्छा नहीं है 'खामखाह ' का होना!








