Tuesday, November 18, 2008

कभी.?.


किसी एहसास को अपने गले लगाया है कभी
क्या देख तुमको कोई गम मुस्कुराया है कभी
दर्द से सुनी है क्या कभी खुशी की दास्तान ?
या जी गया तेरी मेरी जिंदगी कोई दो पल का मेहमान
ये एक सवाल रोज मेरे साथ रहता है
क्या इसका तुम्हारे पास कोई जवाब आया है कभी ?
क्या लिखी है कभी तुमने समन्दर को चिठ्ठी
कि आजकल नम भी हो पाती नही आंखों की मिटटी
ऐसा लगता है कोई ज़ज्बा मर सा गया है, सोचा है
उस ज़ज्बे पे एक कतरा तुमने क्यों नही बहाया है कभी ?
मेरे चारो तरफ़ उड़ रहे है ख्यालों के परिंदे
और ढूंढ़ रहे है मुझे तन्हाई के बाशिंदे
मैं छुप क्यों रह हू आख़िर अपने आप से भी
क्या तुम्हारा अक्स भी तुम्हे आईने से दूर लाया है कभी ?
मैं हैरान हू ,परेशान हू
ख़ुद ऐसे सवालों से
और जैसे मुझ पर हंसा
कोई जवाब तुम पर मुस्कुराया है कभी ?

2 comments:

अर्श said...

bahut hi khoobsurat nazm hai parul? sochne ki udaan kahan tak jaa sakti hai, iska mujhe kabhi andaza na ho saka aur aap jaise log kabhi hone bhi na denge, jahan socho ki bas yahi theher jayegi, wahin se kisi ek katre se uthke fir udne lagti hain ;)

i am also "getting poetic", ispe recently chaar lines likhi thi -

Phir wahi anjaana mil gaya tha
bhoola sa ek afsaana mil gaya tha kahin,
chhod aaye the jise sheher-e-badnaam mein kabhi,
deewana wahi shayraana mil gaya tha kahin

kaam chal raha hai ispe, dekhte hain kab poori hogi.

kuchh hamari nazmo pe bhi gaur farmane padhariye - http://dayaar-e-arsh.blogspot.com/

amar said...

good ..
nice words !!