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उम्र धानी सी


अब भी उलझी है नींद में
तुम्हारी उँगलियों की थपकी
अब भी मन के बंजर में
कोई तुम सा रहता है
तुम बीती रातों के चाँद ही सही
अब भी अम्बर के सूनेपन में
तुम्हारा दरिया बहता है !
अब भी आँखों के धागे
बनाकर ख़्वाबों की किश्ती
डूब जाते है तुम में
खोजते है वही बस्ती
जहाँ मिटकर रोज ही
बनता हूँ मैं
वहां यादों का कारवां
अक्सर ही ठहरता है !
वो कुछ हरफ जो अब भी
होंठो से चिपके रहते है
मेरी ख़ामोशी को
तेरी ग़ज़ल कहते है
और तन्हाई जैसे
तेरी महफ़िल हो जाती है
मेरा वजूद हर रोज ही
ऐसे तुझको पहरता है !
यही होता है बस
जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
और हो जाती है
फिर एक उम्र धानी सी
तुझको तरसती जिंदगी की
हर साँस पानी सी
और मेरा वजूद पल पल
बूँद-बूँद तुमसे भरता है !

49 comments:

जयकृष्ण राय तुषार

बहुत ही सुंदर कविता मन प्रसन्न हो गया| पारुल जी आपकी लेखनी में निरंतरता के साथ-साथ ताजगी भी बनी रहे |बहुत सुखद लगा बधाई और शुभकामनाएं |

: केवल राम :

यही होता है बस
जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ

यहाँ कविता में रहस्य का भाव उभर आता है और हर एक लिबास में तुझे तरजीह देना खुद के अस्तित्व को तुझ में शामिल करना है ..बहुत सुंदर भाव ..आपका आभार

संजय भास्कर

वाह जी,
इस कविता का तो जवाब नहीं !
विचारों के इतनी गहन अनुभूतियों को सटीक शब्द देना सबके बस की बात नहीं है !
कविता के भाव बड़े ही प्रभाव पूर्ण ढंग से संप्रेषित हो रहे हैं !

Apanatva

sadaiv kee bhati badiya abhivykti.......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)

बहुत बढ़िया लिखी है आपने!
बधाई!

कौशलेन्द्र

"कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ"
यही तो दीवानापन है ........गज़ब की नज़्म है

Udan Tashtari

"कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ"

अहा!! क्या बात है..बहुत खूब पारुल!!

रजनीश तिवारी

जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
...tum hi tum..
bahut badhiya !

Gaurav Singh

jeeti rahiye....:)

प्रवीण पाण्डेय

प्रेम भरे ये हल्के हल्के लम्हे सदा याद रहते हैं।

इमरान अंसारी

सुभानाल्लाह.....पारुल जी बहुत दिनों बाद आपकी पोस्ट आई ...शानदार, बेहतरीन, लाजवाब लगी......आजकल आप हमारी दहलीज़ पर कभी नहीं आते.....कोई खता हुई क्या हमसे...

Sonal Rastogi

रूमानी सा ...एक तो पिया परदेस में ऊपर से ऐसी नज़्म ..अब मैं क्या करूं

वन्दना

्गहन अनुभूति का चित्रण …………बहुत सुन्दर रचना।

noopur

no words dear,,its ur great achievement!!!

noopur

no words dear,it's great achievement...keep it up.

noopur

no words dear,,keep it up..

विशाल

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति.

और हो जाती है
फिर एक उम्र धानी सी
तुझको तरसती जिंदगी की
हर साँस पानी सी
और मेरा वजूद पल पल
बूँद-बूँद तुमसे भरता है !

बहुत खूब.

chirag

बहुत खूब
अति सुन्दर
हर शब्द खास हैं

कृष्णं वन्दे जगद्गुरूं

इसी के नूर में श्री कृष्ण ने गीता थी कही.
इसी की रोशनी में आयतें उतरीं थीं कभी.

Read Full Poem In Blog..

Blog is waiting your comments


http://paraavaani.blogspot.com/2011/04/blog-post_01.html

विवेक Call me Vish !!

bahut sundar...rachna!!

Chinmayee

क्या बात है....

बहुत ही सुन्दर

shekhar suman

वाह बहुत खूब.... आजकल मैं कम ही ब्लोग्भ्रमण कर पाता हूँ..लगता है आप भी व्यस्त हैं बहुत दिनों बाद शायद आपके ब्लॉग पर कुछ पोस्ट किया है आपने.....
खैर देर आये और दुरुस्त भी....

JHAROKHA

parul ji
bahut hi badhiya avam antas tak pahunchne wali aapki rachna bahut hibehatreen hai.
bahut hi gahan anubhuti se ot-prot aur sudarta ke saath shbdo ka chayan.
ek bhav-bhini prastuti
bahut badhai
poonam

सहज साहित्य

दिल के हर कोने का कोमलता से स्पर्श करती कविता !

wordy

umda!

wordy

silsila jaldi jaldi jari rakhiye..

Anonymous

touchy!!



vartika.

दिगम्बर नासवा

ताज़गी लिए हवा के झोंके की तरह लाजवाब नज़्म ... बहुत ही उम्दा ...

M VERMA

जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
और शायद यही वह रंग है जो शाश्वत है

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

दीप

जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
और शायद यही वह रंग है जो शाश्वत है

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

हरकीरत ' हीर'

तुम बीती रातों के चाँद ही सही
अब भी अम्बर के सूनेपन में
तुम्हारा दरिया बहता है !

पारुल आपकी नज्मों में अब परिपक्वता आती जा रही है ....!!

अनामिका की सदायें ......

फिर एक उम्र धानी सी
तुझको तरसती जिंदगी की
हर साँस पानी सी
और मेरा वजूद पल पल
बूँद-बूँद तुमसे भरता है !

bahut lajawab rachna....bahut sunderta se katra katra kar ke ehsaso ki fuharo se rachna ka sawan barsaya hai.

संगीता स्वरुप ( गीत )

यही होता है बस
जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
और हो जाती है
फिर एक उम्र धानी सी

वाह बहुत सुन्दर ...

Vivek Jain

बहुत बढ़िया
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

वर्षा

सुंदर उम्र धानी सी

राकेश कौशिक

"जब भी खुद को बुनता हूँ
कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
और हो जाती है
फिर एक उम्र धानी सी
तुझको तरसती जिंदगी की
हर साँस पानी सी"

कितनों को झकझोर दिया - वाह वाह

Dilbag Virk

wah!
sahityasurbhi.blogspot.com

ritu

ye to sidhe sidhe bhawnaon ki nakkashi hai!

Anonymous

baat dil mein ghar kar gayi!

ritu

vakai har lafz khaas hai!



vartika!

veerubhai

fir ek umr dhaani si ,
tujhko tarasti zindgi kee ,
har saans paani si ,
kismat apni apni kahaani si .....
veerubhai .
(bhaav kanikaaon ke liye badhaai ...)

anusuya

ohh kya baat hai!

anusuya

ohh kya baat hai!

AMIT

ultimate!

Ashish

as usal close to my heart :)

Kunwar Kusumesh

गहन अनुभूति का चित्रण

सुशीला पुरी

कोई भी लिबास हो
रंग तेरा ही चुनता हूँ
!!!!!!!!!!!!!!
सुन्दर !!!!!!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल"

आपकी शब्दों में जादू है ...

Utkarsh

excellent, exceptional, flow of emotions with words