Tuesday, March 1, 2011

सिलसिला..



याद है तुम्हे
कभी मेरे जीवन का धागा
तुम्हारी जिंदगी में उलझ गया था !
उधड गया था मैं यकायक
सुलझाने में जब तुमसे खींच गया था !
बिखर गए थे जैसे सारे ताने-बाने
एक दूजे में सिमटे से दो अनजाने
मैं भटक गया था लफ़्ज़ों के फेर में
और तुम कहीं ख़ामोशी के ढेर में
इस बेवक्त की खींचतान में
वो प्रीत भरा ख़त यूँ ही फट गया था !
किस अल्हड़पन से ले रहे थे हम पंगें
उड़कर अपने-अपने मन की पतंगें
एक डोर-दूजी डोर से लिपटने को थी
जैसे हाथ लग गयी थी दबी सी उमंगें
देर तक चलता रहा था ये सिलसिला
और बस फिर नींद के मांझे से मांझा कट गया था !

46 comments:

Mukesh Kumar Sinha said...

aur nind ke manjhe se manjha kat gaya...:)

behtareen prastuti..!

सागर said...

मुझे भी छंद लिखना सिखा दें... तुकबंदी मैं भी सीखना चाहता हूँ, कैसे जोड़ा जाता है इसमें... कई बार तो मक्तक या छनिका सी बनती है. पर पूरी कविता नहीं, हालांकि यह आपकी पिछली कविताओं से कमज़ोर हैं पर भाव पक्के हैं/लग रहे हैं...

रश्मि प्रभा... said...

bade gahre khyaal

क्षितिजा .... said...

रिश्तों के तागे बहुत कच्चे होते है ... ज्यादा खींचतान में टूट जाने का डर रहता है ,,, बहुत खूब पारुल जी

vijaymaudgill said...

sagar ji k sath main bhi sehmat hu.

पी.एस .भाकुनी said...

इस बेवक्त की खींचतान में
वो प्रीत भरा ख़त यूँ ही फट गया था !
sunder abhivyakti,
abhaar.......

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

पारुल जी
सादर सस्नेहाभिवादन !


कभी मेरे जीवन का धागा
तुम्हारी जिंदगी में उलझ गया था !
उधड गया था मैं यकायक
सुलझाने में जब तुमसे खींच गया था !

बहुत भावपूर्ण !
जीवन के अनापेक्षित वाकयों का अंतर की नमी के साथ चित्रण ! मन में घर बनाने में समर्थ रचना के लिए आभार !

और बस फिर नींद के मांझे से मांझा कट गया था …

कविता का समापन भी मन को स्पर्श करता है …
एक उत्कृष्ट रचना के लिए साधुवाद !

बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

nilesh mathur said...

बहुत ही सुन्दर और संवेदनशील!

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत खूबसूरत कविता /बहुत ही खूबसूरत सोच के लिए आपको बधाई |निरंतरता की उम्मीद के साथ ...........

Anupam karn said...

उधड गया था मैं यकायक
सुलझाने में जब तुमसे खींच गया था !

"अनुपम" compare करना मेरी फितरत नही!

निर्मला कपिला said...

नींद के माझे न जाने कितनी सपनो की डोर काट देते हैं। अच्छे भाव्\ शुभकामनायें।

Minakshi Pant said...

इतना खुबसूरत की शब्दों में ब्यान करने के बाद भी दिल को सुकून नहीं मिल रहा बहुत ही खुबसूरत अंदाज़ और उतना ही खुबसूरत शब्दों का ताना - बाना |
बहुत बहुत बधाई दोस्त |

प्रवीण पाण्डेय said...

संबंध भी धागों की तरह उलझने लगें तो उन्हें खीचने की बजाय सुकून से सुलझाना होता है।

Sonal Rastogi said...

अजीब सा सोंधापन है इस रचना में

हरकीरत ' हीर' said...

इस नज्म में आप एक पूरा भाव लेकर चलीं हैं ....
शुरू से अंत तक .....
बहुत सुंदर .....!!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

यकीन मानिये पारुलजी, जब भी अपने में अकेला होता हूं, चाहता हूं हवा के झौंको संग झूमना या फिर स्मृतियों की आगोश में खोना, या किसी प्रेम की स्वप्नील तरंगों में खुद को डूबो देना तो आपकी रचनायें मुझे हरहमेश सराबोर कर दिया करती है। जो खुद के अन्दर खोजता हूं, वो यहां मिल जाता है। बहुत नाजुक होते हैं शब्द और उनके गहरे अर्थ जो मुझे बहला दिया करते हैं। यह रचनाकार की सार्थकता है कि उससे किसी को सुख पहुंच रहा है या कोई अपनी चीज उसकी रचनाओं मे देख रहा है। धन्यवाद दूंगा आपको, क्योंकि मैं सोच सकता हूं किंतु लिख नहीं सकता। और लिखा हुआ मैं यहीं पा जाता हूं।
बहरहाल,"सुलझाने में जब तुमसे खींच गया था !..." में 'खींच' दूर होने संबंधित भी अनुभव हुआ, और वो डोर जो आपस में लिपटी थी, जिसका दार्शनिक भाव यही प्रतीत हुआ कि लिपटना संकेत है छूटने का, कट जाने का..। एक फारसी शे'र याद आ रहा है, जिसका मजमून कुछ इस प्रकार है कि- " दफअतन तर्के तआल्लुक भी एक रुसवाई है, उलझे दामन को छुडाते नहीं यूं झटका देकर..."। खैर...। बहुत अच्छी रचना।

' मिसिर' said...

ओफ्फो !! ये नींद भी मुसीबत है !

बड़ी खूबसूरती से लिखी है कविता ,पारुल जी !!

crazy devil said...

वहां,
उन अलसाए रस्तों के किनारे
सुस्त सा दरिया है कोई.
कभी बचपन में मैंने
वहां कागज़ की इक नाव डाली थी.
सूना है कि,
आज भी वह नाव वहां मद मस्त बहती है

सुमन'मीत' said...

bahut sundar....

Mansoor Naqvi said...

bahut khoob.. kaisi hain parul ji..??

Coral said...

खूबसूरत....

कुश said...

सागर से सहमति है.. पिछली रचनाओ से थोडी कच्ची पर भाव पक्के

Patali-The-Village said...

बड़ी खूबसूरती से लिखी है कविता| धन्यवाद|

क्रिएटिव मंच-Creative Manch said...

बस फिर नींद के मांझे से मांझा कट गया था !

वाह बहुत खूब
लेखन में ताजगी है
सुन्दर भावों से सजी सुन्दर रचना
बधाई / आभार

VIJUY RONJAN said...

मैं भटक गया था लफ़्ज़ों के फेर में
और तुम कहीं ख़ामोशी के ढेर में
lafzon ke fer me khamoshi dher ho hi jaati hai...bahut badhiya likha hai aapne..sadhuvaad.

V!Vs said...

ultimate ji

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... जिंदगी का टांका उध्द जाए तो सँभालने में बहुत वक़्त लगता है ... दिल के जज्बातों को लिख दिया है आपने ...

sagebob said...

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति.
सलाम.

Ashish said...

hmm :)

Ashish said...

is silsiley ko aage badhao ab :)

wordy said...

gud one..keep going!!

महफूज़ अली said...

मांझे से मांझा कट गया...... यह लाइन तो कमाल की हैं.... बहूऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊत ही ख़ूबसूरत कविता...........


Regards

वृजेश सिंह said...

लफ्जों के फेर और खामोशी के ढेर में उलझे रिश्तों की दास्ताँ का अच्छा चित्रण है. एक दुसरे को जानने और समझने की प्रक्रिया में कभी बेवक्त ही ऐसी खामोशिओं से हमारा साबका पड़ता है. लेकिन हमारी तलाश कायम रहती है. जिस कवि की कल्पना में जिन्दगी प्रेम गीत है, वह एक प्रेम ख़त फट जाने से और प्रेम ख़त लिखना थोड़ी छोड़ देगा. हाँ बस दर्द गहरा हो तो भरने में वक्त लग जाता है. अच्छी रचना के लिए शुक्रिया

Ravi Rajbhar said...

Wah kitane gahri baate hain..!

ending bahut achchi hai.

der se aane ke liye mafi chahunga.

JHAROKHA said...

parul ji
bahut hi batreen prastuti jo gahan bhavo ko samete hue hai .
bahut bahut dhanyvaad
poonam

pooja said...

bahut bahut badiya.........mazza aa gaya padh kar.........

muskan said...

आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

ritu said...

dil ke kareeb lagi!

Anonymous said...

sarahaniy prayas!

Anonymous said...

soch se uljhna har kisi ke bas ka nahi!


vartika!

M VERMA said...

यूँ तो रिश्तों की डोर नाजुक होती है पर उलझे बिना सुलझ्ती भी नहीं

Manpreet Kaur said...

बहुत ही सुंदर रचना है जी ! हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर आये !
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Apanatva said...

sadaive kee bhati choo gayee ye rachana bhee.

ab swasthy me sudhar hai.

महफूज़ अली said...

No.......new post.... busy schedule?????? hope very soon will see new post...


Regards

राजेन्द्र राठौर said...

bahot achchi lagi.

जयकृष्ण राय तुषार said...

आदरणीया पारुल जी नमस्ते |लिखने की गति इतनी धीमी क्यों हो गई है |एक पाठक होने के नाते जानने की जिज्ञासा हो रही है |