Tuesday, November 18, 2008

"सिलसिले"


तेरे दिल से मेरे दिल तक
जो एक सिलसिला चला
यूं लगा जैसे मोहब्बत का
एक काफिला चला
उसमें आरजू भी थी
जिन्दगी की जुस्तजू भी थी
जैसे कि साथ अपने
अपने ही दिल का फलसफा चला !
उसमें कुछ उमंगें भी थी
मन की पन्तंगे भी थी
और ऐसा लगा कि
रूह संग, खुदा चला!
इंतज़ार की कतार में
एक दुसरे के प्यार में
वो अजनबी सा वक्त
बन के रहनुमा चला!
तेरी चाहत चली
मेरा ज़ज्बा चला
गुमशुदा ख़्वाबों को हासिल करने सा
हौंसला चला!
लफ्ज़ खामोशी में उलझे
न जाने ये अफसाना कहाँ सुलझे
तुम्हे देखा तो लगा
मेरे संग मेरा आइना चला !
वहां अब भी भीड़ है
और है बातों का झुरमुट
वहीं कहीं से तो ही
जिंदगी का कारवां चला !

2 comments:

www.creativekona.blogspot.com said...

Parulji;
Silsile,Naseehat aur Kabhee teenon hee kritiyan bahht sundar. Bina kisi lag lapat ke seedhe aur sateek shbdon men hridaya kee bhavnavon ko apne abhivyakti dee ha.Vase prem ko lekar jyadatar najmon men nirasha hee adhik dikhtee ha ,par apkee kritiyan bheed se alag hat kar han.again congratulations.Ap apnee kavitaon,najmon ko hindi kee achchee patrikaon men bhee bhejiye.
Samaj kee Naagfaniyon par apne jo char linen likhii han unhen bhee devlop kariye,achchee rachna banegee.Shubhkamnaen.
Hemant Kumar

amar said...

nice rhythm ...
certainly justify the title of the blog !!! :)