Friday, February 12, 2010

इश्क !(प्रेम दिवस पर विशेष )


मेरा तेरा इश्क देखकर
देखो सूरज जलता है ॥
अपनी ख्वाहिशों के झुरमुट में ही
कहीं रोज ये दिन सा पिघलता है ॥
मैं शब्दों की फिरकी बनाकर
जब भी तुम पर फेंकता हूँ
तेरे मेरे बीच में ये
पगली सी हवाओं संग फिरता है ॥
प्यार भरे लफ़्ज़ों में अक्सर
ख़ामोशी को सुलगाता है
और फिर अपनी ही साजिश में
बनकर राख सा उड़ता है ॥
मैं जब भी तुमसे अपने
ख्वाबों की बातें कहता हूँ
तुमको यूँ पाने की खातिर
वो रोज रातों से लड़ता है ॥
और फिर वो डूबता जाता है
अपनी ही तन्हाई में
जब हम दोनों के इश्क का चाँद
ख्वाहिशों के अम्बर पर चढ़ता है ॥
कैसे भी करके जाने क्यों
तुम में समाना चाहता है
समझ रहा हूँ आखिर क्यों वो
इतना घटता-बढ़ता है ॥
मैं कागज़ की नाव बनाकर
उसको बचाना चाहता हूँ
और एक वो है जो रोज
सांझ के दरिया में ही गिरता है ॥

(कागज़ की नाव =अपनी भावनाओं से)

Wednesday, February 10, 2010

फितरत!!


जूनून बसता है मेरी आँखों में
सुकून कहीं और है
मैं चुप करता हूँ लफ़्ज़ों को
तो खींचता ख़ामोशी का शोर है
रोज होता है कुछ न कुछ ख्वाबगाह में
मगर मिलता नहीं कुछ सोच की पनाह में
और मुड़ जाता हूँ उन बेचैनियों की राह पर
जहाँ चलता बस कलम का जोर है ॥
शहर दर शहर ढूंढता हूँ मैं जिंदगी का चेहरा
अपने वजूद का शायद उस पहचान से है रिश्ता गहरा
उसको यूँ ही पाने की फितरत में
होती जा रही खुद की जरुरत कमजोर है ॥


एक बार फिर रविश जी के ब्लॉग की कुछ पंक्तियाँ भा गयी
ये प्रयास भर है..किसी भी गलती के लिये माफ़ी चाहूंगी..

Sunday, February 7, 2010

घर !


वो जब कहता था कुछ,मैं सोच में पड़ जाता था
अपने सवाल से वो,मेरे ख्यालों को उमर देता था !
मन के किसी कोने में,जब मैं रहता था चुपचाप
वो मेरी तन्हाई को अपने ख़्वाबों का शहर देता था !
मैं भरता जाता था खुद में समन्दर की तरह
और वो ठहरे पानी में उम्मीद की एक लहर देता था !
मैं अक्सर रहता था जब खुद से बेखबर
वो मुझको,मेरे होने की खबर देता था !
मैं देख पाता नहीं था जब कुछ भी अच्छा
वो मुझको,देखने को अपनी नज़र देता था !
जिंदगी भी जब मुझको समझ न पाती थी
वो मेरे साथ होकर,जिंदगी का असर देता था !
वो खेलता था जब मेरे संग आँख मिचोली
तो जैसे मुझे, मेरे ही खो जाने का डर देता था !
मैं छोड़ देता था जब कभी अपना ठिकाना
वो मुझे हमेशा अपने मन का घर देता था !

Thursday, February 4, 2010

रुक!


आज फिर थोड़ी सी जिंदगी
मन के करघे पे कात लूं ॥
ख्वाहिशों के धागों से
बुनने को फिर कोई बात लूं ॥
बैठे रहे यूँ देर तक
ख़ामोशी के कहकहो में
खो जाये साँसों को ढूँढने
उम्मीद की तहों में
थोडा सा रुक,मन कह रहा है
मैं जिंदगी को भी साथ लूं ॥
आ तो गए है संग हम
इस ख़्वाबों के मेले में
करनी है तुमसे गुफ्तगू
मुझको मगर अकेले में
कोई ख्वाब लेने से पहले
सोचता हूँ बाजार से एक रात लूं ॥

Tuesday, February 2, 2010

मन करता है ....


कुछ कहने का मन करता है
सोच की उन तंग सी गलियों में रहने का मन करता है
वो लिखने का मन करता है
जो शब्दों की अबूझ पहेली है
जिस सोच का कोई अंत नहीं
जिन जज्बों से ये दुनिया खेली है
जो ख़ामोशी से रिस न सकी
उस अनकही में बहने का मन करता है ॥
क्यों आखिर खुद में रहते नहीं
क्यों औरों को जीते है
सच्चाई को ढांपने की होड़ में
हम ख़ामोशी भी सीते है
क्यों नहीं करते खुद का विरोध
क्यों सब सहने का मन करता है ॥
क्यों कोई मसीहा लगता है
हमको परदे के किरदार में
क्यों बिक जाते है जीवन-चरित्र
संवेदनाओं के व्यापार में
अवसाद भरे इस खोखले पन का
अब ढहने का मन करता है ॥

(रविश जी के ब्लॉग से प्रेरित होकर)

Monday, February 1, 2010

विजेता !


थोडा सा तू यकीं रख
थोडा सा एतबार कर
तुझे जिंदगी से हो न हो
मगर तू खुद से प्यार कर ॥
वक़्त ने चाहे कितने भी हो
अँधेरे किये
उम्मीद दिल में जलाये है
रोशनी के कई दीये
रातों का न तू खौफ रख
सुबह का इंतज़ार कर ॥
मुश्किलें भी है जरुर
माना कुछ भी आसां नहीं
कोशिश तो करके देख
होगा तेरे पास क्या नहीं
कुछ कर गुजरने से पहले
यूँ ही न अपनी हार कर ॥
खुद को जीत जाना ही
जिंदगी की जीत है
गर तुझको खुद से प्रेम है
तो जिंदगी से भी प्रीत है
इस प्रीत के संबल से तू
औरों के भी दिल गुलज़ार कर ॥
एक राह कहीं रुक गयी
तो मंजिलें खत्म नहीं
गर होंसला है दिल में तो
मेहनत कभी बेदम नहीं
अपने इसी जुनूं से तू
नया रास्ता इख्तियार कर ॥
तुझे जिंदगी से हो न हो
मगर तू खुद से प्यार कर ................................. ॥

Thursday, January 28, 2010

बंजारे!


चल ऐ मन बंजारे
इस दुनिया का भी भरम देखे
कहीं सुलगते से दिल में ही
जीवन जैसा कुछ नम देखे !
कुछ गोल गोल टुकड़े देखे
रूखे सूखे चाँद से
चूल्हे में जलता सूरज देखे
सपनों की ढलती सांझ से
देखे जीवन की मरुभूमि
न बारिश का मौसम देखे !
आखिर क्यों देखे हम इतना
राँझा क्यों बिछड़ा हीर से ?
ऐ मन तू बस इतना समझ
न होगा भला प्रेम की पीर से
क्यों न बन जाये खुद कठोर
क्यों औरों में ही कुछ नरम देखे !
चुगते चुगते पानी के मोती
तुम और हम थक जायेंगें
फिर भी न बन पायेंगें समन्दर
ये प्यास यूँ ही रख जायेगें
फिर क्यों न इन अभिलाषाओं का
संग कहीं खत्म देखे !
करता जायेगा मन मानी
तो खुद से आँख मिला न पायेगा
तू खुद से यूँ रुखसत होकर
दुनिया से जा न पायेगा
आईने को चल झुठला दे
आँखों में थोड़ी शरम देखे !

Monday, January 25, 2010

ख़ामोशी !!



तुम न आये मगर
ख़ामोशी आकर चली गयी
लफ्ज़ छिपते फिरे
पर वो सब सुनाकर चली गयी !
सुना भी क्या इस दिल ने
एक अदना सा फ़साना
जिसमें सिर्फ तन्हाई थी
मुश्किल था तुम्हे पाना
तेरे इंतज़ार में एक अरसे से
मैं एक रात भी न बुन पाई
और वो एक पल में
जिंदगी को ख्वाब बनाकर चली गयी !!
मैं जब तलक थी इस सोच में
तुम क्यों नहीं आये?
उसने अपने किस्से
यूँ कई बार दोहराए
मैं पूछ न सकी कुछ भी
वो कहती चली गयी
मेरी ख़ामोशी पे सवाल उठाकर चली गयी !!


Tuesday, January 19, 2010

उलझन!




तू जूझ रहा था जब अपनी ही उलझन से
मैं आ उलझा तुझ में खुद इस मन से
अश्क खुद-ब-खुद आँखों से उलझ रहे थे
धीरे धीरे उम्मीद के सब दीये बुझ रहे थे
गांठें कई पड़ गयी थी इस खीचतान में
उभर रहे थे जाने कितने झोल जबरन से !
ये गांठें कहीं न कहीं दोनों को चुभ रही थी
ख़ामोशी चुपचाप दर्द की पहेली बूझ रही थी
मैं झाड़ रहा था ख्वाबों को,शायद कुछ मिल जाये
पर दूर कर न पाया सिलवटें तेरी शिकन से !
उलझते जा रहे थे जैसे सोच के सब धागे
कुछ भी तो नहीं था कोरे ख्यालों से आगे
मैं साफ़ कर न पाया अपने अक्स पे पड़ी गर्द
और खामखा उलझता जा रहा था दर्पण से !
महसूस हो गया था ख्वाहिशें कहीं कमजोर थी
टूटी हुई मन से मन की डोर थी
सून रहा था मैं दिल के उस शोर को
जहाँ आह खुद उलझ रही थी चुभन से !