Thursday, February 4, 2010

रुक!


आज फिर थोड़ी सी जिंदगी
मन के करघे पे कात लूं ॥
ख्वाहिशों के धागों से
बुनने को फिर कोई बात लूं ॥
बैठे रहे यूँ देर तक
ख़ामोशी के कहकहो में
खो जाये साँसों को ढूँढने
उम्मीद की तहों में
थोडा सा रुक,मन कह रहा है
मैं जिंदगी को भी साथ लूं ॥
आ तो गए है संग हम
इस ख़्वाबों के मेले में
करनी है तुमसे गुफ्तगू
मुझको मगर अकेले में
कोई ख्वाब लेने से पहले
सोचता हूँ बाजार से एक रात लूं ॥

28 comments:

Ashish said...

koi khwaab lene se pahle
sochta hoon bajar se ek raat loon..
wah!

wordy said...

simple words...deep thoughts
u have a wonderful collection of poems..g8 job.

M VERMA said...

थोडा सा रुक,मन कह रहा है
मैं जिंदगी को भी साथ लूं ॥
बहुत खूब --- सुन्दर भाव

दिगम्बर नासवा said...

ख्वाहिशों के धागों से
बुनने को फिर कोई बात लूं ...

बहुत खूब .......... अक्सर मन चाहता है उन सभी ख्वाहिशों को पूरा करना ..... जो हसीन लम्हों को सिमेट कर बुनी होती है ....... बहुत की कोमल एहसास .........

हृदय पुष्प said...

आज फिर थोड़ी सी जिंदगी
मन के करघे पे कात लूं ॥
ख्वाहिशों के धागों से
बुनने को फिर कोई बात लूं ॥
बैठे रहे यूँ देर तक
ख़ामोशी के कहकहो में
खो जाये साँसों को ढूँढने
उम्मीद की तहों में
थोडा सा रुक,मन कह रहा है
मैं जिंदगी को भी साथ लूं ॥
....
कोई ख्वाब लेने से पहले
सोचता हूँ बाजार से एक रात लूं ॥
"आज सच ही कहा था"
ढेरों आशीष के साथ

रंजना said...

वाह..वाह..वाह... बहुत ही सुन्दर भाव...सुन्दर अभिव्यक्ति..

monali said...

Bahut hi sundar...

निर्मला कपिला said...

आज फिर थोड़ी सी जिंदगी
मन के करघे पे कात लूं ॥
ख्वाहिशों के धागों से
बुनने को फिर कोई बात लूं ॥
पारुल मैं तो तुम्हारी फैन बन गयी लाजवाब और मुझे लग रहा है
थोडा सा रुक,मन कह रहा है
मैं जिंदगी को भी साथ लूं ॥ मैं पारुल को साथ ले लूँ आशीर्वाद्

Apanatva said...

parul.....
bahut sunder bhavo kee ye bunaee.............
bahut dil ko hai bhaee...........

सागर said...

पहले तो शुकर है ब्लॉग हिंदी में है... अंग्रेजी नाम देख कर तो दर गया था... पढता हूँ कभी फुर्सत से...

Neeraj Singh said...

बहुत ही सधी हुई अभिव्यक्ती - "कोई ख्वाब लेने से पहले सोचता हूँ बाजार से एक रात उधार ले लूं ॥"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर प्रतीकों के साथ उत्कृष्ट रचना!

मधुकर राजपूत said...

वाया कस्बा शब्दों की लय तक पहुंचा हूं। बहुत लयदार लफ्ज हैं। बड़ी संज़ीदा रचनाएं। कवित्त की यही ख़ासियत है कि हर किसी की कहानी होता है और इससे समानुभूति(Empathy)हो जाती है। बहुत बढ़िया लगीं आपकी रचनाएं।

Sudhir (सुधीर) said...

आज फिर थोड़ी सी जिंदगी
मन के करघे पे कात लूं ॥


Waah Bahut Khoob...Achchhi Lagi aapki yeh rachna...

Suman said...

कोई ख्वाब लेने से पहले
सोचता हूँ बाजार से एक रात लूं ॥nice

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत खूब कहा!


आज फिर थोड़ी सी जिंदगी
मन के करघे पे कात लूं ॥

Parul said...

aap sabhi ka hardik aabhar!

अजय कुमार said...

शब्दों की सुंदर चित्रकारी , बधाई

Arvind Mishra said...

अभिव्यक्ति का नयापन और सृजनशीलता की सोंधी महक लिए रचना -

संजय भास्कर said...

बहुत जोरदार rachnaa...

अनिल कान्त : said...

simply beautiful

Razi Shahab said...

बैठे रहे यूँ देर तक
ख़ामोशी के कहकहो में
खो जाये साँसों को ढूँढने
उम्मीद की तहों में
थोडा सा रुक,मन कह रहा है
मैं जिंदगी को भी साथ लूं

it's realy nice...achchi kavita

आमीन said...

Thanks for come to my blog... but my new blog is dafaa512.blogspot.com. and mydunali.blogspot.com
so pls visit that..

Madam you submit 5 comments on my old blog. thanks. your blog is too good, thats nice... dear,

your writing is again excellent.. too too much good.. thanks to give such a blog to us.

RAHUL said...
This comment has been removed by the author.
rahul kumar said...

nice. achchhi lagi aapki kavita .

Babli said...

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मेरे इस ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है!
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ही सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है!

Rakesh Pathak said...

lajbab bahut sundar badhai ho jarur bunuga riste ke is door ko prem ke karghe par...

निर्झर'नीर said...

exceelent creation ..bandhaii ho