Wednesday, August 4, 2010

मेरी कलम!


चलती है मन की कलम तो सुकूं सा है
ये कल्पनाओं का घरोंदा मेरे लिये जुनूं सा है !!
जो सोच अक्सर इर्द-गिर्द रहती है मेरे
उसको शब्दों में पिरोना, खुद से गुफ्तगू सा है !!
ये 'आह' है, नहीं इसकी खातिर 'वाह' की गुजारिश
ये एहसास जिंदगी की जुस्तजू सा है !!
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
इसकी महक है,गर हर दिल तक
तो बस ये मेरी 'खुशबू' सा है !!
एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !!

58 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !

बहुत सुन्दर ...मन की गहराती तक पहुंची आपकी बात

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

बहुत ही बेहतरीन रचना
बहुत बहुत बधाई।

P S Bhakuni (Paanu) said...

जो सोच अक्सर इर्द-गिर्द रहती है मेरे
उसको शब्दों में पिरोना, खुद से गुफ्तगू सा है !!
sunder rachna.....

Gaurav Kant Goel said...

'Wah' ki gujarish nahi hai, per kambakht 'wah - wah' nikal hi jaati hai.. :D

Keep pouring your thoughts...!!

मनोज कुमार said...

ऐसे ही निर्बाध आपकी क़लम चलती रहे।

Sonal Rastogi said...

यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
bahut khoob ..wakai mein is nazm mein rooh hai

arvind said...

एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !! ...ruha hilaa denevaali najm.bahut khubsurat.

Apanatva said...

adbhut.......
ati sunder......
sach hee khushboo ban samaae huee ho ...........
har rachana ek se bad kar ek hai.............aur ye to .......dil me chap gayee............
aabhar

Deepak Shukla said...

Hi..

Teri nazm ki khushböo se..
Antarman mahke sabke..
Tumhen chah na "WAH" ki ho, par..
Man ke bhav dikhe sabke..

Bahut hi khoobsurat nazm..
Main to jarur kahunga.. "WAH"..

Deepak..

Anonymous said...

वाह.... उम्दा रचना!!

Virendra Singh Chauhan said...

Kya baat hai... bahut hi badiyaa. Shaandaar.

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर !

Saumya said...

हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !!...wow...beautiful garland of words!

ताऊ रामपुरिया said...

एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !!

बहुत नायब रचना.

रामराम.

Mithilesh dubey said...

बहुत ही बेहतरीन रचना
बहुत बहुत बधाई।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन से लिखी गयी रचना तो रूह से निकलती है।

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Beautiful lines ,I must appriciate.
Pl have my best wishes.
regards,
dr.bhoopendra
jeevansandarbh.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !!
--
बहुत ही बढ़िया लिखा है!
बधाई!

kumar zahid said...

जो सोच अक्सर इर्द-गिर्द रहती है मेरे
उसको शब्दों में पिरोना, खुद से गुफ्तगू सा है !!
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!



बहुत अच्छे ख्यालात..मुबारकबाद अच्छी जमीन पर चल पड़ी हैं आप.

हरकीरत ' हीर' said...

चलती है मन की कलम तो सुकूं सा है
ये कल्पनाओं का घरोंदा मेरे लिये जुनूं सा है !!

नज़्म को सुंदर लफ्ज़ दिए ......!!

Udan Tashtari said...

ये 'आह' है, नहीं इसकी खातिर 'वाह' की गुजारिश
ये एहसास जिंदगी की जुस्तजू सा है !!


-वाह नहीं करते मगर आह!! की आह! में आह! तो मिला सकते हैं, बहुत सुन्दर!

बेचैन आत्मा said...

ये 'आह' है, नहीं इसकी खातिर 'वाह' की गुजारिश
ये एहसास जिंदगी की जुस्तजू सा है !!
...बेहतरीन गज़ल का खूबसूरत शेर. इसे पढ़कर इस ब्लॉग से चुपके निकला नहीं जा सकता.

Shekhar Suman said...

bahut hi sundar...
ek kavi ke dil se nikalkar seedha kagaj par utri hai..
behtareen...

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

Searching said...

Very nice.

अभिन्न said...

बहुत संजीदा रचना ..ये तो खासकर पसंद आये
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
....
एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !!
लिखते रहिये ...बहुत अच्छा लिखते हो

Ashish (Ashu) said...

सुन्दर भावों से भरी हुयी........है आपकी रचना .

Anonymous said...

yu have magic of words!
hats off!


vartika!

anusuya said...

lafzon ki sundar bangi!

ritu said...

kya baat..kya baat..kya baat

Rajeev Bharol said...

आपकी सभी कवितायें बहुत पसंद आईं. धन्यवाद.

उठा पटक said...

बहुत बढिया!

sanu shukla said...

बेहद उम्दा....वाह

anjana said...

बहुत खुब । बेहतरीन रचना


आप मेरे ब्ल‌ाग पर आये और अपने विचार व्यक्त किये । आप क‌ा बहुत-बहुत ध‌न्यवाद ।

Coral said...

बहुत सुन्दर लिखती है आप .... मै बहुत कम ब्लोगिंग करती हू पर जब भी करती हू आपका ब्लॉग जरुर आकर पढ़ती हू!

Vijay Pratap Singh Rajput said...

बहुत सुन्दर
बहुत बहुत बधाई।

vinodbissa said...

bahut shandar lekhan hai aapka ...... shubhkamanayen..

JHAROKHA said...

बेहतरीन नज्म-----।

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

ये एहसास जिंदगी की जुस्तजू सा है !!
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
इसकी महक है,गर हर दिल तक
तो बस ये मेरी 'खुशबू' सा है !! पारुल जी, आत्ममंथन की यही स्थितियां ही बेहतरीन रचनाओं को जन्म देती हैं। बेहतरीन रचना।

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

ये एहसास जिंदगी की जुस्तजू सा है !!
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
इसकी महक है,गर हर दिल तक
तो बस ये मेरी 'खुशबू' सा है !! पारुल जी, आत्ममंथन की यही स्थितियां ही बेहतरीन रचनाओं को जन्म देती हैं। बेहतरीन रचना।

hem pandey said...

'इसकी महक है,गर हर दिल तक
तो बस ये मेरी 'खुशबू' सा है !!'

- लेखन की सार्थकता इसी में तो है

पंकज मिश्रा said...

Parul g,
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
bahoot shaandaar. badhai.

विनोद कुमार पांडेय said...

जो सोच अक्सर इर्द-गिर्द रहती है मेरे
उसको शब्दों में पिरोना, खुद से गुफ्तगू सा है !!

पारूल जी, बेहद भावपूर्ण एक उम्दा प्रस्तुति...बधाई

Gain some more knowledge said...

Khubsurat Rachna ....

har Ek shabd Kavi hriday ko bakhubi se vyakhya karta hai ...

Keep Engraving emotions on the paper...

Besh Wishes !!!

Mansoor Naqvi said...

KAMAAAAAL......

Sonal said...

ati sundar.... or lafz nahi hai kehne ke liye,...


mere naye blog par aapka sawagat hai..apna comment dena mat bhooliyega...

http://asilentsilence.blogspot.com/

महफूज़ अली said...

तो बस ये मेरी 'खुशबू' सा है !!
एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !

यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं...

सॉरी... आजकल मैं ना... थोडा सा बिज़ी हूँ... इसलिए लेट आया .........

chandrakant said...

bahut badhiya shabdo ko chayan kar unhe lay main pirona bahut achha laga.

boletobindas said...

आपके अंदर कविता कूट कूट कर भरी है क्या....या दर्द को सहारा मिल रहा है शब्दों का........

निर्मला कपिला said...

यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है !!
इसकी महक है,गर हर दिल तक
तो बस ये मेरी 'खुशबू' सा है !!
वाह लाजवाब। बधाई

अमिताभ श्रीवास्तव said...

सोच और उस सोच से सराबोर होकर लिखना शब्दों में गज़ब की कशिश पैदा कर देता है। हमेशा की तरह बेहतर लेखन।
हालांकि गज़ल, नज़्म जैसी विधा का ज्ञान मुझमें नहीं है किंतु इसके गणित में मात्राओं की भूमिका अहम होती है और शायद वह खूबसूरत भी बन पडती है।

दिगम्बर नासवा said...

एक कसक से उठी,नज़्म भर नहीं
हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है ....

रूह से निकले हुवे शब्दों की दास्तान .... सुंदर रचना है ...

Rajat Narula said...

bahut hi umda rachna hai !

"दीप फर्रूखाबादी" said...

classic creation ! keep it up !

anupama said...

हर लफ्ज़ इसका मेरी रूह सा है !
waah!

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बहुत सुन्दर रचना बधाई। इ्समे से एक मिसरा मुझे व्याकरण के लिहाज़ से खटक रहा है । "इसकी महक है गर हर दिल तक, तो बस ये मेरी ख़ुशबू सा है" इस पंक्ति में "महक" केन्द्र बिन्दु है अत: "ख़ुशबू सा" की जगह "ख़ुश्बू सी" आनी चाहिये।।

Anand Rathore said...

ये 'आह' है, नहीं इसकी खातिर 'वाह' की गुजारिश
ये एहसास जिंदगी की जुस्तजू सा है !!
यूँ लगता है हो रही हूँ धीरे धीरे,खुद से मुखातिब
मेरा वजूद कहीं,मुझसे रु-ब-रु सा है.

bahut khoob ...

'साहिल' said...

very nice composition...