Wednesday, May 8, 2013

बस !

मैं चुप हूँ
हाथों में सुनहरी धूप मलने तक
और फिर ऐसे ही
उस कोरे से चाँद के जलने तक !!
मुझे मालूम है
तुम यूँ ही नहीं लौट जाओगे
कुछ तो रह जाओगे यहीं
यादों के खलने तक !!
अच्छे भी लगोगे शायद
कुछ हरे होकर
थोड़ी सी जिंदगी
से भरे होकर
टूट जायेंगें खिलोने मगर
तुम्हारा मन बहलने तक !!
इतना तो है कि
इश्क अब खुरदुरा होगा
चुभेगा टीस सा
इस से ज्यादा क्या बुरा होगा
लौट पाऊँगी नहीं मैं
खुद में,तुम्हारे निकलने तक !!
ख़त के लिफ़ाफे भी कि
जैसे हो गए खंडहर
ख़ामोशी अक्सर ही
मचाती है लफ़्ज़ों का बवंडर
यही रुक जाओ बस अब
इश्क का मतलब बदलने तक !!


16 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

बस .....
यहीं रुक जाओ
इश्क का मतलब
बदलने तक ....
बहुत खूब कहा .../

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,

RECENT POST: नूतनता और उर्वरा,

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,

RECENT POST: नूतनता और उर्वरा,

Majaal said...

बहुत अच्छे!

लिखते रहिये ...

Madan Saxena said...
This comment has been removed by the author.
Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. ....

vandana gupta said...

bahut khoob

Aparna Bose said...

nice ....
http://boseaparna.blogspot.in/

राकेश कौशिक said...

वाह वाह - इश्क अब खुरदरा होगा

कौशलेन्द्र said...

लौट पाऊँगी नहीं मैं ख़ुद में तुम्हारे निकलने तक ......
प्रेम की कोमल अनुभूति इसीलिये तो खुरदुरी बन जाती है।
अच्छे बिम्बों के साथ एक अच्छी सी कविता।

Yashwant Mathur said...

बेहतरीन


सादर

Onkar said...

सुन्दर रचना

RAHUL- DIL SE........ said...

रूक भी जाओ .....

differentstroks said...

very very sweet...

wordy said...

simply superb!!

मदन मोहन सक्सेना said...

बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.हार्दिक बधाई और शुभकामनायें!
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |


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