Thursday, July 22, 2010

क्यों दिखती नहीं वो..











वो मुट्ठी बंद थी एक रोज से
जो जब तब खुल जाती थी
वो भी कोई दौर था
जब जिंदगी आबो-हवा में घुल जाती थी ।
वो एक ख़्वाबों की खुसफुस
जो बड़ा शोर करती थी
एक चुप्पी पे भी अम्मी
तब बड़ा गौर करती थी
न था ऐसा कभी कि
हसरत यूँ ही फिजूल जाती थी ।
एक कोरे से मन पर
जाने कितने रंग रहते थे
फलक के कुछ तारे
रात दिन संग रहते थे
एक झोंकें में अनगिनत
ख्वाहिशें झूल जाती थी ।
रात के तकिये तले से
चुराते वो नानी के पोथे
गहरी नींद के दरिया में
वो चाँद संग गोते
हाँ!कभी कभी अपनी जगह
परियां भी स्कूल जाती थी ।
एक भोली सी जिद पे
छोटी सी जंग होती थी
कोई सरहद नहीं थी शायद
ख्वाहिशें पतंग होती थी
वो मुझ में इतना खोयी थी
कि खुद को भूल जाती थी ।
पर अब किसने बो दिए
उन्ही आँखों में कुछ मंजर कंटीले
रोज छिलते है वो सपने
रोज होते है अब गीले
बड़ा मासूम सा दिल है
कहीं कोई तो मुश्किल है
पूछता है 'अब क्यों दिखती नहीं वो '
'जिंदगी पहले तो रोज मिल जाती थी'

48 comments:

सागर said...

एक चुप्पी पे भी अम्मी
तब बड़ा गौर करती थी

देख आया हूँ...

एक भोली सी जिद पे
छोटी सी जंग होती थी
कोई सरहद नहीं थी शायद
ख्वाहिशें पतंग होती थी

अब का जिक्र तो है पर अभी का ?

"तेरा कूचा, तेरी गली काफी है,
बेठिकानो को ठिकाने की जरुरत क्या है.

--- जगजीत गा रहे हैं

Aparna Manoj Bhatnagar said...

एक चुप्पी पे भी अम्मी
तब बड़ा गौर करती थी

देख आया हूँ...

एक भोली सी जिद पे
छोटी सी जंग होती थी
कोई सरहद नहीं थी शायद
ख्वाहिशें पतंग होती थी
bahut khub!

महफूज़ अली said...

हमेशा की तरह .... आई ऍम टच्ड...

अरुणेश मिश्र said...

पारुल ! किशोर वय का स्वर्णिम संसार झाँकता है इस प्यारी नज्म में ।
अति सराहनीय ।

Apanatva said...

bahut sunder bhavo kee abhivykti.......
kash hum bachapan fir se louta laate .

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

गहरी और सुन्दर भावनाओं से ओत-प्रोत कृति लाजवाब है

Mansoor Naqvi said...

Bahut sunder... itne khoobsurat shabd kaha se laati hain aap..??
kaash hum bhi aisa likh paate....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

मनोज कुमार said...

'जिंदगी पहले तो रोज मिल जाती थी' ॥

Sonal Rastogi said...

रात के तकिये तले से
चुराते वो नानी के पोथे
गहरी नींद के दरिया में
वो चाँद संग गोते
हाँ!कभी कभी अपनी जगह
परियां भी स्कूल जाती थी ।
bachpan kaa aanchal kas ke thaama huaa hai aapne ...maasoom kavitaa

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर, कमाल के भाव हैं, बेहतरीन!

Mayurji said...

bachcho ke nanhe hatho ko chand sitare choone do
char kitabe padhkar yeh bhi hum jaise ho jayenge.


bahut khub likha hai aapne.

visit my blog please at
http://mayurji.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पर अब किसने बो दिए
उन्ही आँखों में कुछ मंजर कंटीले
रोज छिलते है वो सपने
रोज होते है अब गीले

बेहद भावपूर्ण रचना...और प्रवाह बहुत खूबसूरत है .

M VERMA said...

पर अब किसने बो दिए
उन्ही आँखों में कुछ मंजर कंटीले
रोज छिलते है वो सपने
रोज होते है अब गीले
मासूम सा सवाल है ..
बहुत भावपूर्ण रचना

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!

कुश said...

कभी कभी अपनी जगह
परियां भी स्कूल जाती थी ।

यहाँ पर जाके नज़्म मैच्योर हो जाती है.. रोमांटिक माहोंल से निकलकर यहाँ पर ठहरना भी काबिल ए तारीफ़ है.. और ख्वाहिशो का पतंग होना लाजवाब है..

वाणी गीत said...

यूँ ही जिंदगी को ढूंढते है हम सभी ...
मगर जब गाती मुस्कुराती हमारे साथ होती है तो बेकद्री और अभिमान भी हम ही करते हैं ...
सुन्दर रचना ...!

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी कोमलता से भावों को पिरो दिया।

arvind said...

हमेशा की तरह .... अति सराहनीय ।

एक विचार said...

सराहनीय ।

Amitraghat said...

"पुराने बचपन जैसी ही मासूम कविता..."

wordy said...

likhi to aap hamesha kamaal ho..yahan bhi jindagi ka tana-bana sundar band pada hai..

wordy said...

by the way blog bhi sundar ban pada hai...:)
gud luck!

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं |
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं |

Anonymous said...

kitni kashish hai is kalam mein..au ye sawaal sabke jehan mein hai..parul..kya kehoon..nayab hai!


vartika

Anonymous said...

kitni kashish hai is kalam mein..au ye sawaal sabke jehan mein hai..parul..kya kehoon..nayab hai!


vartika

anusuya said...

so beautifully yu have written..#

Divya said...

उन्ही आँखों में कुछ मंजर कंटीले
रोज छिलते है वो सपने
रोज होते है अब गीले

waah !

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर और उम्दा रचना.

रामराम.

संजय भास्कर said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

Mastan singh said...

Bahut sunder

JHAROKHA said...

पर अब किसने बो दिए
उन्ही आँखों में कुछ मंजर कंटीले
रोज छिलते है वो सपने
रोज होते है अब गीले
बड़ा मासूम सा दिल है
कहीं कोई तो मुश्किल है
पूछता है 'अब क्यों दिखती नहीं वो '
'जिंदगी पहले तो रोज मिल जाती थी'
Bahut badhiya aur sarthak kavita...aj ke sandarbha men.

singhsdm said...

बड़ा मासूम सा दिल है
कहीं कोई तो मुश्किल है
पूछता है 'अब क्यों दिखती नहीं वो '
'जिंदगी पहले तो रोज मिल जाती थी' ॥

..........नए एहसासों में रच बसी एक सुन्दर रचना....! जो ज़िन्दगी का मतलब जानते हैं उन्हें इस बात का अफ़सोस ज़रूर रहता होगा कि 'अब क्यों दिखती नहीं वो ज़िन्दगी.......'

Udan Tashtari said...

फोटो बदल ली. :)

Vijay Pratap Singh Rajput said...

बहुत बढ़िया बहुत सुन्दर,सराहनीय लाजवाब रचना

Mansoor Naqvi said...

Aapne apne blog ko bahut sunder design kiya hai.. I also want to do so.. will u help me, how did u do..

Mansoor Naqvi said...

Aapne apne blog ko bahut sunder design kiya hai.. I also want to do so.. will u help me, how did u do..

Anonymous said...

एक भोली सी जिद पे
छोटी सी जंग होती थी
कोई सरहद नहीं थी शायद
ख्वाहिशें पतंग होती थी...
...कमाल की पंक्तियाँ है .

हरकीरत ' हीर' said...

फिर कई सारे सवाल लिए खड़ी है आपकी नज़्म ....

और बचपन की कुछ मासूम यादें .....

बहुत सुंदर .....!!

दिगम्बर नासवा said...

एक भोली सी जिद पे
छोटी सी जंग होती थी
कोई सरहद नहीं थी शायद
ख्वाहिशें पतंग होती थी ..

बहुत खूब .. बचपन की यादों को खैंच कर बाहर ले आई है आपकी रचना ....
बहुत लाजवाब ...

boletobindas said...

एक चुप्पी पे भी अम्मी
तब बड़ा गौर करती थी

हाँ!कभी कभी अपनी जगह
परियां भी स्कूल जाती थी

कितने प्यार से आपने बातों को कहा है। वो बचपन की यादें। आह कहां गए वो मस्ती के दिन।

महफूज़ अली said...

मुझे यह कविता इतनी अच्छी लगी ...कि मैं फिर से आ गया....

हैट्स ऑफ़ टू यू...

रिगार्ड्स...

Ravi Rajbhar said...

Bahut hi sunder parul ji.

www.ravirajbhar.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 27 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

Parul said...

sangeeta ji charcha ke liye shukriya :)

baaki sabhi ka bhi hardik aabhar :)

Avinash Chandra said...

एक चुप्पी पे भी अम्मी
तब बड़ा गौर करती थी

khubsurat...behad khubsurat

सहज साहित्य said...

आपकी यह कविता तो बहुत सशक्त है । बहुत बधाई !

सुमन'मीत' said...

आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ .......... बहुत सुन्दर रचना........... अब आना होता रहेगा .......