Friday, February 10, 2012

दस्तक..


लफ़्ज़ों ने दिल पे दस्तक दी
कि अरसे से कुछ लिखा नहीं
यूँ तो सोच रोज़ सुलगी
धुआं कहीं दिखा नहीं॥
मैं रोज़ ख्यालों के दर पर
जाकर भी लौट आता था
जाने वो अनजाना सा वजूद
देखकर भी मुझे क्यूँ चीखा नहीं ॥
गोल करता रह जाता था ख्वाब
चाँद के आकार में
इश्क की नासमझी में
दर्द भी बिका नहीं ॥
एक 'हद' तलाशने
फिरता रहा हूँ दर-ब-दर
आज ये मालूम हुआ कि
जिंदगी सा कुछ फीका नहीं ॥

42 comments:

सागर said...

एक 'हद' तलाशते
फिरता रहा हूँ दर-ब-दर
आज ये मालूम हुआ कि
जिंदगी से कुछ फीका नहीं.

:)

Anupama Tripathi said...

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार ११-२-२०१२ को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।

Asha Saxena said...

भावपूर्ण रचना है
आशा

प्रवीण पाण्डेय said...

एक मरुथल सा हृदय में,
मृगतृष्णा है नाम तुम्हारा

वन्दना said...

शायद सही कहा।

sushma 'आहुति' said...

आज ये मालूम हुआ कि
जिंदगी से कुछ फीका नहीं....बहुत-बहुत ही अच्छी भावपूर्ण रचनाये है......

vidya said...

इश्क की नासमझी में दर्द भी बिका नहीं...

बहुत सुन्दर...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यह कैसा सन्नाटा है ? जीवन में तो हर पल रंग बदलते हैं ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 13/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

M VERMA said...

अंतर्द्वंद और ....

vandana said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति

Swati Vallabha Raj said...

shabd yu hi dastak dete rahe aur ye mahfil yu hi sajti tahe...sundar rachna...

Prakash Jain said...

Wah, bahut khoob....

http://www.poeticprakash.com/

सदा said...

बहुत बढि़या।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मेरी टिप्पणी कहां गयी ??????? स्पैम में देखिएगा ॥

Reena Maurya said...

बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति है....

इमरान अंसारी (عمران انصاری) said...

सबसे पहले तो खुशामदीद.....अरसा हो गया आपको पढ़े हुए....उम्दा नज़्म....लिखती रहिये पारुल जी आपको पढना अच्छा लगता है ।

sangita said...

भावभीनी अभिव्यक्ति है|बधाई इतना अच्छा लिखने के लिए|मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है|

जयकृष्ण राय तुषार said...

आपने बहुत दिन बाद ही सही लेकिन अच्छा लिखा है |वसीम बरेलवी का एक शेर है कि -अगर जिन्दा है तो ,जिन्दा नज़र आना जरूरी है |आप की कलम अब न रुके तो अच्छा होगा |आपका एक पाठक -

Onkar said...

bahut sundar

Anonymous said...

jindagi bhale hi fiki ho...yahan to mithaas hi hai...!!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

...कि अरसे से कुछ लिखा नहीं...


..कायल हूँ ....

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
शुभकामनाएँ

boletobindas said...

एक काफी लंबे अर्से बाद आपकी पोस्ट पर आना हुआ..तब पता चला कि आप खुद कई दिनों से दरवाजे के बाहर ही बाहर चक्कर लगा रही हैं..यानि एक लंबी खामोशी...हैरानी है कि आपकी पोस्ट का सिलसिला थमा सा है बेहतरीन कविताओं की कोई पोस्ट धीमी हो जाए अच्छी बात नहीं...जल्दी से चालू हो जाएं..वैसे भी एक महीने से ज्यादा हो गया है.

Coral said...

बहुत सुन्दर !

Mired Mirage said...

सुन्दर!
घुघूती बासूती

Kulwant Happy "Unique Man" said...

लफ्जों ने दिल पे दस्‍तक दी, कि अरसे से कुछ लिखा नहीं,
यूं तो सोच रोज सुलगी धुआं कहीं दिखा नहीं।

बहुत बेहतरीन, हर बार की तरह, लेकिन अफसोस लम्‍बे अर्से बाद लौटा हूं।

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत अच्छी कविता पारुल जी |

Anupam karn said...

जिंदगी सा फीका कुछ भी नही ....सच है
पर, जिंदगी सा रुचिकर भी तो कुछ नही!

shekhar suman.. शेखर सुमन.. said...

बहुत खूब.... आपके इस पोस्ट की चर्चा आज 14-6-2012 ब्लॉग बुलेटिन पर प्रकाशित है ...अरे आप लिखते क्यूँ नहीं... लिखते रहें ....धन्यवाद.... अपनी राय अवश्य दें...

Noopur said...

First time i steeped in here....nice post

Vinay Prajapati said...

बहुत ही सुंदर

Monika Jain said...

Beautiful :)

Vivek VK Jain said...
This comment has been removed by the author.
Shanti Garg said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
जन्माष्टमी पर्व की शुभकामनाएँ
मेरे ब्लॉग

जीवन विचार
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Sanju said...

Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.

***HAPPY INDEPENDENCE DAY***

fenwick said...

Yes

राकेश कौशिक said...

"यूँ तो सोच रोज़ सुलगी
धुआं कहीं दिखा नहीं"

Noopur Kothari said...

Loved it....keep up the good work...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...


एक 'हद' तलाशने
फिरता रहा हूँ दर-ब-दर
आज ये मालूम हुआ कि
जिंदगी सा कुछ फीका नहीं

बहुत अच्छा लिखा है
पारुल जी !

ज़िंदगी से हम कई पहलुओं से साक्षात्कार करते हैं …

मैंने लिखा -
ज़िंदगी दर्द का फ़साना है !
हर घड़ी सांस को गंवाना है !
जीते रहना है , मरते जाना है !
ख़ुद को खोना है , ख़ुद को पाना है !

चांद-तारे सजा’ तसव्वुर में ,
तपते सहरा में चलते जाना है !
जलते शोलों के दरमियां जा’कर ,
बर्फ के टुकड़े ढूंढ़ लाना है !


अच्छी कविता के लिए पुनः बधाई !
शुभकामनाओं सहित…

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



पारुल जी
नमस्कार !
पोस्ट बदले हुए बहुत समय हो गया है …
आशा है सपरिवार स्वस्थ सानंद हैं

आपकी प्रतीक्षा है सारे हिंदी ब्लॉगजगत को …
:)
नई रचना के साथ यथाशीघ्र आइएगा …
शुभकामनाओं सहित…
राजेन्द्र स्वर्णकार

Madan Mohan Saxena said...

भावपूर्ण रचना
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