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एक रोज..


मैं भटकता था रोज ही जैसे अपने आप में
खुद से खुद तक तय किये फासलों की नाप में
वहीँ एक रोज मेरा साया मेरे साथ लग गया था
और जिंदगी सा कुछ मेरे हाथ लग गया था !
कुछ जल रहा था मुझ में
सूरज था या कि चाँद था
कोई भोर का टुकड़ा सा
या फिर सुनहरी सांझ था
यूँ लगा कि जैसे तन्हाई की तिल्ली से मैं ही सुलग गया था !
मुझको मेरे होने का एहसास जो दिन-रैन था
इतना तो पहले भी मैं खाली होकर भी न बेचैन था
अपने वजूद क गुमनाम से सवाल पर
हाथ जैसे कोई उलझा हुआ जवाब लग गया था !
हो गया था आइना खुद ,मेरी ही तस्वीर सा
चुभ रहा था जैसे 'मैं' खुद में ही एक तीर सा
कुछ रंग फैलने लगे थे फिर पानी पर
मुझको मालूम था दिल से फिर कोई ख्वाब लग गया था !

30 comments:

अनामिका की सदायें ......

bahut sochne par mazboor karti sunder post.

प्रवीण पाण्डेय

दर्पण बहुधा यह बोध करा देता है।

राकेश कौशिक

"हो गया था आइना खुद, मेरी ही तस्वीर सा
चुभ रहा था जैसे 'मैं' खुद में ही एक तीर सा"

संतोष कुमार

Waah !!
Bahut sunder kavita , bahut shubhkaamnayen.

जयकृष्ण राय तुषार

गहन वैचारिक सोच -विचार से निकली एक उत्कृष्ट कविता पारुल जी बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं

जयकृष्ण राय तुषार

गहन वैचारिक सोच -विचार से निकली एक उत्कृष्ट कविता पारुल जी बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)

स्वतन्त्रता दिवस के पावन अवसर पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ।

संगीता स्वरुप ( गीत )

ये ख्वाब भी न ... अच्छी अभिव्यक्ति

Ashish

Bahut achha Parul... Bahut hi achhaa...

Dr.Nidhi Tandon

चुभ रहा था जैसे 'मैं' खुद में ही एक तीर सा
कुछ रंग फैलने लगे थे फिर पानी पर
मुझको मालूम था दिल से फिर कोई ख्वाब लग गया था............बहुत ही सुन्दर...हम सभी के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं ..जब खुद से खुद की नजदीकी भी अखरने लगती है.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur)

बेहतरीन।
------
स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

कल 17/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

vandana

चुभ रहा था जैसे 'मैं' खुद में ही एक तीर सा
कुछ रंग फैलने लगे थे फिर पानी पर
मुझको मालूम था दिल से फिर कोई ख्वाब लग गया था.....

यह ख्वाब का ही असर है कि खुद को नए नजरिये से देखने लगता है इंसान

ana

bahut sundar.....ati uttam

सदा

वाह ...बहुत खूब कहा है ।

इमरान अंसारी

बहुत खूबसूरत.......खुद में खुद की तलाश.......लाजवाब|

Minakshi Pant

कुछ जल रहा था मुझ में
सूरज था या कि चाँद था
कोई भोर का टुकड़ा सा
या फिर सुनहरी सांझ था
बहुत गहन रचना जो बहुत कुछ कह रही है |
सुन्दर रचना |

boletobindas

पारुल जी आपकी कवितों को पड़ना एक अलग ही अहशास है...लगता है जैसे कभी जिंदगी का कोई भुला लम्हा मिल गया हो...कैसे लिखती है आप इतना..मैं हमेशा ही सोचता रहता हूँ पड़ने के बाद....पर जवाब हमेशा ही नदारद मिलता है....

अनुपमा त्रिपाठी...

कल-शनिवार 20 अगस्त 2011 को आपकी किसी पोस्ट की चर्चा नयी-पुरानी हलचल पर है |कृपया अवश्य पधारें.आभार.

S.VIKRAM

"हो गया था आइना खुद, मेरी ही तस्वीर सा
चुभ रहा था जैसे 'मैं' खुद में ही एक तीर सा"

वाह!!!.......बार बार पढने को दिल करता है....धन्यवाद:)

दिगम्बर नासवा

बहुत गहरे जज्बात ... ये ख्वाब कभी कभी अंदर तक चुभते हैं तीर से ... बेहतरीन रचना ..

आप ने कई दिनों से लिखना कम कर रक्खा है ... आशा है सब कुशल मंगल होगा ...

Rakesh Kumar

कुछ जल रहा था मुझ में
सूरज था या कि चाँद था
कोई भोर का टुकड़ा सा
या फिर सुनहरी सांझ था

पारुल जी,सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति है आपकी.
हर शब्द प्रभावशाली है.
बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

kumar

khaw to khaw hain....inmen kashish bhi hai...khalish bhi...jeene ka ehsaas bhi....

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार

आदरणीया पारुल जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

मासूम जज़्बातों की गहरे अल्फ़ाज़ों में तर्ज़ुमानी … … …

कुछ रंग फैलने लगे थे फिर पानी पर
मुझको मालूम था दिल से फिर कोई ख्वाब लग गया था !

आपकी नज़्म से जो मिला वह बयान करने की नहीं , महसूस करने की चीज़ है …
मुबारकबाद के साथ शुक्रिया !


विलंब से ही सही…
♥ स्वतंत्रतादिवस सहित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !♥
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Babli

बहुत सुन्दर और लाजवाब रचना लिखा है आपने !बधाई!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Udan Tashtari

बहुत गहरी रचना....


आजकल हो कहाँ???

Vijay Kumar Sappatti

बहुत कुछ कह गयी आपकी ये नज़्म .. शब्दों के अपने भाव होते है ..


बधाई !!
आभार
विजय
-----------
कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Vinay Prajapati 'Nazar'

सुंदर और मनमोहक रचना है

wordy

waah...

wordy

gujarish hai.....likhte rahiye!

Onkar

gahan vicharon ko aapne sundar abhivyakti di hai