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एक ख्याल ....


तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।
उन बेचैन बेमियादी सी रातों में
जब आँखों का काजल सुलगता था
कहीं उस नूर में
मेरा वो चाँद भी चमकता था
एक रोज किसी ख्वाब के छिलके पे
फिसलेगा अम्बर भी
ये पक्के तौर पर मैंने यूँ भी मान रखा था ॥
बात उस रोज अपने चाँद को टांकने की थी
जिद फिर रात की सिलवटों में झाँकने की थी
मन से उधडी हुई एक नज़्म के धागे रखता था
नया बुनने की हसरत लिये ही बस जगता था
कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था ॥
मैं छोड़ आया था कुछ किस्से
इसी सांझ के मुहाने पर
बड़ा ही हल्ला था उस रोज
समन्दर बसाने पर
मैंने जब गौर से देखा अपनी उसी नज़्म को
तो उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था ॥

71 comments:

anoop joshi

aaj pahli baar puri kavita pad kar comment de raha hun.

bahut khoob.........

anoop joshi

aaj pahli baar puri kavita pad kar comment de raha hun.

bahut khoob.........

Sunil Kumar

सुंदर रचना के लिए साधुवाद

Ashish

kuch samajh main aaya.. aur kuch nahi bhi aaya :)

soni garg

सुन्दर अभिव्यक्ति !

Gaurav Kant Goel

bohot sunder..... :D

Majaal

इतनी लजीज की रहा न गया,
टूटे वादे, की सहा न गया,
आखिर खानी ही पड़ी हमें नज्म उनकी,
यूँ तो हमने आज उपवास रखा था .. !

Poorviya

bahut hi sunder rachana hai

arvind

bahut khubsurat khayaal...achhi rachna.

दिगम्बर नासवा

बहुत खूब .. कुछ गुनगुने से ख्वाब पालने लगते हैं पढ़ कर .... लाजवाब .....

अमिताभ श्रीवास्तव

बहुत नाजुक सी रचना है। जिस तरह करवट तले चान्द रखा गया है और वह भी नींद के सिरहाने, कितनी मुलायम सी बात है, मखमली बात है। जितने भी बिम्ब चुने हुए हैं वे पूरी रचना में चार चांद लगाते नज़र आते हैं। पारुलजी, आपकी इसी खासियत का दीवाना हो चला हूं मैं। मुझे जब भी बेहद इमानदाराना, बेहद नरम सी सीधे दिल तक पहुंचने वाली रचनाये पढने का मूड होता है, आपका ब्लॉग हमेशा साथ निभाता है। धन्यवाद।

A

Too good.

राजेश उत्‍साही

अद्भुत कल्‍पना है।

ana

अति उत्तम ...........नयापन दिखा.............बहुत अच्छा लगा ....बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)

तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।
--
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

डॉ .अनुराग

.सुभान अल्लाह !!

Udan Tashtari

बहुत गहरा रचती हो..पढ़कर मनन करना होता है, बधाई.

tapish

bas unhi aap likhte rahe aur hum padhte rahe

संगीता स्वरुप ( गीत )

कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था ॥
मैं छोड़ आया था कुछ किस्से
इसी सांझ के मुहाने पर
बड़ा ही हल्ला था उस रोज
समन्दर बसाने पर
मैंने जब गौर से देखा अपनी उसी नज़्म को
तो उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था


वाह बड़ा खूबसूरत ख़याल है ....सुन्दर

प्रवीण पाण्डेय

कोमल मन भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति।

Mrs. Asha Joglekar

करवट तले चांद और वह बी नींद के सिरहाने वाह क्या बात है पारुल जी ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)

- एक रोज किसी ख्वाब के छिलके पे
फिसलेगा अम्बर भी

- कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था

- मैंने जब गौर से देखा अपनी उसी नज़्म को
तो उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था

कुछ बेहतरीन पंक्तियाँ.. नये बिंब और बेहद प्रभावशाली लेखनी..

Udan Tashtari

हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

Akshita (Pakhi)

वाह, कित्ती प्यारी रचना...बधाई.

_____________
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

wordy

phir ek gol nazm..amazing

Anonymous

remarkable again




vartika!

JHAROKHA

parul ji behad pasand aai aapki yah rachna jo kitni gahraai se likhi hai aapne.sach ,shabdo ka chunav kabile tarrif hai.
poonam

विवेक Call me Vish !!

wahhhh ek ek shad apni duniya liye hai ..... !! mere blog pr bhi dastak dain ??

JAI HO MANGALMAY HO

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari

चांद सी नज्‍़म .... धन्‍यवाद.

Shekhar Suman

bahut khub.....
wakayi me umdaah....

राजकुमार सोनी

पारूल आज बस इतना ही
मैं एक लेडी गुलजार को अपने सामने खड़ा देख रहा हूं. उसे सलाम करने के लिए अपनी जगह से उठ भी रहा हूं.

उपेन्द्र " the invincible warrior "

कुछ अलग सी लगी... मन को छू गयी

sumant

Itni khoobsurat nazm shayad hi pehle suni ho.

Likhte rahiye

हरकीरत ' हीर'

बड़ी प्यारी सी नज़्म ....
जिसे सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है .....
समझने की हिमाकत नहीं .....!!

साकेत शर्मा

पारुल जी आपकी कविता बहुत अच्छी लगी..
क्या इत्तेफाक है..आपका नाम तो काफी सुना-सुना सा लगता है..

पंकज मिश्रा

बहुत खूब, लाजवाब बधाई

सुधीर

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं।
http://sudhirraghav.blogspot.com/

डॉ. मोनिका शर्मा

bahut hi khoobsurat hai yeh khayal...
pyari rachana

क्षितिजा ....

lovely...

इमरान अंसारी

पारुल जी मैंने पहले भी कहा है ........लफ्जों पर आपकी पकड़ वाकई लाजवाब है ...............फिर एक बार आपने एक बेहतरीन रचना लिखी है, एक पुरुष के भावो के साथ ........मुझे शुरुआत बेहत पसंद आई .........लाजवाब |

कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
http://khaleelzibran.blogspot.com/
http://qalamkasipahi.blogspot.com/

एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|

kumar zahid

बात उस रोज अपने चाँद को टांकने की थी
जिद फिर रात की सिलवटों में झाँकने की थी
मन से उधडी हुई एक नज़्म के धागे रखता था
नया बुनने की हसरत लिये ही बस जगता था
कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था ॥

बेपैबंद सुनहरें टांके
रंग बिरंगे आंके बांके
इनकी तरफ न क्यों कोई झांके ?

लफ्जों की बेशिकन नक्काशी। वाह वाह पारुल!

संजय कुमार चौरसिया

हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन

सुंदर रचना के लिए साधुवाद

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Mansoor Ali

[बड़ी प्यारी सी नज़्म ....
जिसे सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है .....
समझने की हिमाकत नहीं .....!! -हरकीरत ]


बात मानी न हरकीरत की और ,
ग़ौर इस नज़्म पर भी कर आया,
पांव छिलके पे भी पड़ा लेकिन,
'चाँद' सा एक "ख्याल" ले आया .

- mansoorali हाश्मी

राकेश कौशिक

"उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था"
- फिर भी इतना रोशन - लाजवाब प्रस्तुति

सुमित प्रताप सिंह

लगे रहिये...

Coral

बहुत सुन्दर....

Priya

आपने तो शब्दो से चाँद पर नक्काशी कर दी...marvellous!

Nikhil Srivastava

Waah...shandar

' मिसिर'

वाह वाह, क्या बात है,कमाल का तखय्युल और
तगज्जुल,बहुत उच्च कोटि की कल्पना और
उसका भावचित्रण ,आनंद आ गया!
बहुत बधाई!

वीथिका

पारुल जी आपकी रचना कोमल एहसासों की मधुर प्रस्तुति है
पढ़कर मन भीज गया ....................
बहुत बहुत बधाई

सत्यप्रकाश पाण्डेय

सुंदर अभिव्यक्ति.
यहाँ भी पधारें:-
अकेला कलम...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

सुंदर।
---------
ब्लॉगर्स की इज्जत का सवाल है।
कम उम्र में माँ बनती लड़कियों का एक सच।

JHAROKHA

Khoobasurat bhaavanaye sundar shabd-------.

Virendra Singh Chauhan

भई वाह ....मज़ा आ गया .
बहुत सुंदर रचना ...
आभार

दीपक 'मशाल'

बहुत खूबसूरत और नए से बिम्ब लाईं आप.. फिर भी दरख्वास्त है कि ज़रा शिल्प को और कसें..

ZEAL

beautiful creation !

mridula pradhan

bahut sunder.

santosh kumar

सुन्दर अभिव्यक्ति !

तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।

Shekhar Suman

achhi rachna dubara padhne mein kya harz hai.....
isliye chala aaya....

crazy devil

bahut zyada acchi hai

crazy devil

bahut zyada acchi hai

जयकृष्ण राय तुषार

i am very sorry.too late.i was invited by indore doordarshan m p thish is an excellent poem aapki kavita ko mera salaam

aradhana

बड़ी ही मासूम सी कविता है... झीने-झीने भाव लिए.

chirag

superb poem

Dr.R.Ramkumar

तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।


सुन्दर शब्द प्रयोग..नव्य अभिव्यक्ति..

अनामिका की सदायें ......

सुंदर एहसासों से सजी रचना.

boletobindas

क्या बात है। जस्ट वाह..........

अपन के लिए चांद तो क्या कहें....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

बहुत प्यारी कविता कही है आपने।
................
खूबसरत वादियों का जीव है ये....?

Apanatva

kanha ho...?
poora mahina gujar gaya.........

mis you and your comments.

manju

bahut hi sundar rachna hain

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA

bahut umda , Parul ji .
chaand si chamak rahi hai ye kavita ..