Monday, September 13, 2010

एक ख्याल ....


तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।
उन बेचैन बेमियादी सी रातों में
जब आँखों का काजल सुलगता था
कहीं उस नूर में
मेरा वो चाँद भी चमकता था
एक रोज किसी ख्वाब के छिलके पे
फिसलेगा अम्बर भी
ये पक्के तौर पर मैंने यूँ भी मान रखा था ॥
बात उस रोज अपने चाँद को टांकने की थी
जिद फिर रात की सिलवटों में झाँकने की थी
मन से उधडी हुई एक नज़्म के धागे रखता था
नया बुनने की हसरत लिये ही बस जगता था
कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था ॥
मैं छोड़ आया था कुछ किस्से
इसी सांझ के मुहाने पर
बड़ा ही हल्ला था उस रोज
समन्दर बसाने पर
मैंने जब गौर से देखा अपनी उसी नज़्म को
तो उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था ॥

71 comments:

anoop joshi said...

aaj pahli baar puri kavita pad kar comment de raha hun.

bahut khoob.........

anoop joshi said...

aaj pahli baar puri kavita pad kar comment de raha hun.

bahut khoob.........

Sunil Kumar said...

सुंदर रचना के लिए साधुवाद

Ashish said...

kuch samajh main aaya.. aur kuch nahi bhi aaya :)

soni garg said...

सुन्दर अभिव्यक्ति !

Gaurav Kant Goel said...

bohot sunder..... :D

Majaal said...

इतनी लजीज की रहा न गया,
टूटे वादे, की सहा न गया,
आखिर खानी ही पड़ी हमें नज्म उनकी,
यूँ तो हमने आज उपवास रखा था .. !

Poorviya said...

bahut hi sunder rachana hai

arvind said...

bahut khubsurat khayaal...achhi rachna.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब .. कुछ गुनगुने से ख्वाब पालने लगते हैं पढ़ कर .... लाजवाब .....

अमिताभ श्रीवास्तव said...

बहुत नाजुक सी रचना है। जिस तरह करवट तले चान्द रखा गया है और वह भी नींद के सिरहाने, कितनी मुलायम सी बात है, मखमली बात है। जितने भी बिम्ब चुने हुए हैं वे पूरी रचना में चार चांद लगाते नज़र आते हैं। पारुलजी, आपकी इसी खासियत का दीवाना हो चला हूं मैं। मुझे जब भी बेहद इमानदाराना, बेहद नरम सी सीधे दिल तक पहुंचने वाली रचनाये पढने का मूड होता है, आपका ब्लॉग हमेशा साथ निभाता है। धन्यवाद।

A said...

Too good.

राजेश उत्‍साही said...

अद्भुत कल्‍पना है।

ana said...

अति उत्तम ...........नयापन दिखा.............बहुत अच्छा लगा ....बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।
--
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

डॉ .अनुराग said...

.सुभान अल्लाह !!

Udan Tashtari said...

बहुत गहरा रचती हो..पढ़कर मनन करना होता है, बधाई.

tapish said...

bas unhi aap likhte rahe aur hum padhte rahe

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था ॥
मैं छोड़ आया था कुछ किस्से
इसी सांझ के मुहाने पर
बड़ा ही हल्ला था उस रोज
समन्दर बसाने पर
मैंने जब गौर से देखा अपनी उसी नज़्म को
तो उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था


वाह बड़ा खूबसूरत ख़याल है ....सुन्दर

प्रवीण पाण्डेय said...

कोमल मन भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति।

Mrs. Asha Joglekar said...

करवट तले चांद और वह बी नींद के सिरहाने वाह क्या बात है पारुल जी ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

- एक रोज किसी ख्वाब के छिलके पे
फिसलेगा अम्बर भी

- कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था

- मैंने जब गौर से देखा अपनी उसी नज़्म को
तो उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था

कुछ बेहतरीन पंक्तियाँ.. नये बिंब और बेहद प्रभावशाली लेखनी..

Udan Tashtari said...

हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

Akshita (Pakhi) said...

वाह, कित्ती प्यारी रचना...बधाई.

_____________
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

wordy said...

phir ek gol nazm..amazing

Anonymous said...

remarkable again




vartika!

JHAROKHA said...

parul ji behad pasand aai aapki yah rachna jo kitni gahraai se likhi hai aapne.sach ,shabdo ka chunav kabile tarrif hai.
poonam

विवेक Call me Vish !! said...

wahhhh ek ek shad apni duniya liye hai ..... !! mere blog pr bhi dastak dain ??

JAI HO MANGALMAY HO

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

चांद सी नज्‍़म .... धन्‍यवाद.

Shekhar Suman said...

bahut khub.....
wakayi me umdaah....

राजकुमार सोनी said...

पारूल आज बस इतना ही
मैं एक लेडी गुलजार को अपने सामने खड़ा देख रहा हूं. उसे सलाम करने के लिए अपनी जगह से उठ भी रहा हूं.

उपेन्द्र " the invincible warrior " said...

कुछ अलग सी लगी... मन को छू गयी

sumant said...

Itni khoobsurat nazm shayad hi pehle suni ho.

Likhte rahiye

हरकीरत ' हीर' said...

बड़ी प्यारी सी नज़्म ....
जिसे सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है .....
समझने की हिमाकत नहीं .....!!

साकेत शर्मा said...

पारुल जी आपकी कविता बहुत अच्छी लगी..
क्या इत्तेफाक है..आपका नाम तो काफी सुना-सुना सा लगता है..

पंकज मिश्रा said...

बहुत खूब, लाजवाब बधाई

सुधीर said...

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं।
http://sudhirraghav.blogspot.com/

डॉ. मोनिका शर्मा said...

bahut hi khoobsurat hai yeh khayal...
pyari rachana

क्षितिजा .... said...

lovely...

इमरान अंसारी said...

पारुल जी मैंने पहले भी कहा है ........लफ्जों पर आपकी पकड़ वाकई लाजवाब है ...............फिर एक बार आपने एक बेहतरीन रचना लिखी है, एक पुरुष के भावो के साथ ........मुझे शुरुआत बेहत पसंद आई .........लाजवाब |

कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
http://khaleelzibran.blogspot.com/
http://qalamkasipahi.blogspot.com/

एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|

kumar zahid said...

बात उस रोज अपने चाँद को टांकने की थी
जिद फिर रात की सिलवटों में झाँकने की थी
मन से उधडी हुई एक नज़्म के धागे रखता था
नया बुनने की हसरत लिये ही बस जगता था
कुछ रेशमी से धागे धूप के,पलकों में उलझे थे
नाम जिनका इन्ही आँखों ने 'सांझ' रखा था ॥

बेपैबंद सुनहरें टांके
रंग बिरंगे आंके बांके
इनकी तरफ न क्यों कोई झांके ?

लफ्जों की बेशिकन नक्काशी। वाह वाह पारुल!

संजय कुमार चौरसिया said...

हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन

सुंदर रचना के लिए साधुवाद

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Mansoor Ali said...

[बड़ी प्यारी सी नज़्म ....
जिसे सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है .....
समझने की हिमाकत नहीं .....!! -हरकीरत ]


बात मानी न हरकीरत की और ,
ग़ौर इस नज़्म पर भी कर आया,
पांव छिलके पे भी पड़ा लेकिन,
'चाँद' सा एक "ख्याल" ले आया .

- mansoorali हाश्मी

राकेश कौशिक said...

"उसमें लिपटा अम्बर से उतरा पहला चाँद रखा था"
- फिर भी इतना रोशन - लाजवाब प्रस्तुति

सुमित प्रताप सिंह said...

लगे रहिये...

Coral said...

बहुत सुन्दर....

Priya said...

आपने तो शब्दो से चाँद पर नक्काशी कर दी...marvellous!

Nikhil Srivastava said...

Waah...shandar

' मिसिर' said...

वाह वाह, क्या बात है,कमाल का तखय्युल और
तगज्जुल,बहुत उच्च कोटि की कल्पना और
उसका भावचित्रण ,आनंद आ गया!
बहुत बधाई!

वीथिका said...

पारुल जी आपकी रचना कोमल एहसासों की मधुर प्रस्तुति है
पढ़कर मन भीज गया ....................
बहुत बहुत बधाई

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

सुंदर अभिव्यक्ति.
यहाँ भी पधारें:-
अकेला कलम...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सुंदर।
---------
ब्लॉगर्स की इज्जत का सवाल है।
कम उम्र में माँ बनती लड़कियों का एक सच।

JHAROKHA said...

Khoobasurat bhaavanaye sundar shabd-------.

Virendra Singh Chauhan said...

भई वाह ....मज़ा आ गया .
बहुत सुंदर रचना ...
आभार

दीपक 'मशाल' said...

बहुत खूबसूरत और नए से बिम्ब लाईं आप.. फिर भी दरख्वास्त है कि ज़रा शिल्प को और कसें..

ZEAL said...

beautiful creation !

mridula pradhan said...

bahut sunder.

santosh kumar said...

सुन्दर अभिव्यक्ति !

तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।

Shekhar Suman said...

achhi rachna dubara padhne mein kya harz hai.....
isliye chala aaya....

crazy devil said...

bahut zyada acchi hai

crazy devil said...

bahut zyada acchi hai

जयकृष्ण राय तुषार said...

i am very sorry.too late.i was invited by indore doordarshan m p thish is an excellent poem aapki kavita ko mera salaam

aradhana said...

बड़ी ही मासूम सी कविता है... झीने-झीने भाव लिए.

chirag said...

superb poem

Dr.R.Ramkumar said...

तेरी करवट के तले
मैंने अपना चाँद रखा था
तेरी नींद के सिरहाने से
उसको बाँध रखा था।


सुन्दर शब्द प्रयोग..नव्य अभिव्यक्ति..

अनामिका की सदायें ...... said...

सुंदर एहसासों से सजी रचना.

boletobindas said...

क्या बात है। जस्ट वाह..........

अपन के लिए चांद तो क्या कहें....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत प्यारी कविता कही है आपने।
................
खूबसरत वादियों का जीव है ये....?

Apanatva said...

kanha ho...?
poora mahina gujar gaya.........

mis you and your comments.

manju said...

bahut hi sundar rachna hain

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

bahut umda , Parul ji .
chaand si chamak rahi hai ye kavita ..