Wednesday, February 11, 2009

लम्हा भर


एक लम्हे में उजड़ गया था
सपनों का चमन
एक लम्हे में ही खाली था
मन का गगन
जिसको लगी थी एक उम्र पाने में
एक लम्हा भी न लगा उसको खो जाने में॥
ये गीला सा मौसम था
या कि बस मेरा गम था
उसके खोने का एहसास
ख़ुद को पाने से कम था
वो जिसको देखती थी मैं
हरेक शख्स में
वो कैसे गुम हो गया किसी अनजाने में ॥
वो संग था मेरे, तो जैसे न थी कोई कमी
जिंदगी ख़ुद में एक लम्हा सी थी
या कि हर लम्हे में जिंदगी
आज लगता है ख़ुद को देख ये
कि मैं ही मैं अब नही
और लम्हा बन रहा है एक सदी
जिंदगी को भूलाने में॥

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इक उम्र में पाया था, लम्हों में गँवाया है।
छोटी सी शिकायत ने, दिल ऐसा दुखाया है।
गल्ती थी नही मेरी, कुछ भी न खता उसकी-
मधुमास के मौसम में, वीराना सा छाया है।।

Parul said...

bahut khoob keha aapne sir

मुंहफट said...

लम्हों ने खता की
सदियों ने सजा पाई........
आप अपनी सीधी-सच्ची भाषा में यूं ही लिखती रहें. बधाई.
मन का क्षेत्र सूफी होना चाहिए. और कुछ नहीं. बाकी ओर मन भटकता है तो रचना भी भटक जाती है.

मोहन वशिष्‍ठ said...

और लम्हा बन रहा है एक सदी
जिंदगी को भूलाने में॥

बहुत बहुत सुंदर

राजेंद्र त्‍यागी said...

जिंदगी ख़ुद में एक लम्हा सी थी
या कि हर लम्हे में जिंदगी
खूबसूरत, जिंदगी के यथार्थ को छूते अल्‍फाज़। बधाई

रश्मि प्रभा said...

sach hai, pal-pal parivartan hota hai

अखिलेश शुक्ल said...

Parul Ji
apki poems bahot hi acchi hai. Kya na ap inko published karani ka liyai bhaj dai. yadi patrikao ka address nahi malum ho to meri blog per visit kari. apko patrika rivew ka saath address bhi mil jangayi
http://katha-chakra.blogspot.com

Pankaj Upadhyay said...

जिसको लगी थी एक उम्र पाने में
एक लम्हा भी न लगा उसको खो जाने में॥

Bashir badr ki do panktiyan jodta hoon -

"Ye kah kar toot gaya shaakh ka aakhiri phool,
ki ab der hai kitni bahar aane mein "

kaafi achha likhti hain aap, kabhi humare blog par bhi padharen :)