Friday, September 20, 2013

रोज़!!



तुम रोज़ के रोज़ वही होकर के
खफा करते हो
क्यों बदलते नही?
वही होकर के भी क्या करते हो!
बस बार बार ये कहना कि
तुम नई लगो
इसका कोई फ़र्क नही
कि ग़लत लगो या सही लगो
मुझसे शिकवा ही तुम बेवजह करते हो !
ये कैसी ज़िद है तुम्हारी
मैं अपना वजूद उतार दूँ
खुद से ही अजनबी होकर के
मैं तुमको प्यार दूँ
मेरी एक ना पे तुम अपनी
'हाँ' की रज़ा करते हो !

क्या मायने नही रखता
हमारा साथ होना
क्यों ज़रूरी है?
दूर रहकर रोज़ मुलाकात होना
बेमतलब ही तुम इश्क़ को सज़ा करते हो !
छोड़ देते हो अपने वादे
बेज़ुबान चाँद पर
एक ज़िंदगी सा
इंतज़ार सांझ पर
दफ़न होकर के रह जाती हूँ
तुम में ही कहीं
रफू,तुम रोज़ ही
खामोशी की सबा करते हो !

24 comments:

Mukesh Kumar Sinha said...

sundar, pyari si rachna.......dil ko chhuti hui :)

Anonymous said...

welcome back...!
yes,its touchy!!







vartika!!

Rahul... said...

वाह.... हर तारीफ़-प्रशंसा से अलग हटकर...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत खूब,सुंदर रचना !

RECENT POST : हल निकलेगा

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत खूब,सुंदर रचना !

RECENT POST : हल निकलेगा

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (21-09-2013) को "एक भीड़ एक पोस्टर और एक देश" (चर्चा मंचःअंक-1375) पर भी होगा!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

निहार रंजन said...

भावनाओं का तीव्र प्रवाह. बहुत अच्छा लगा.

ARUN SATHI said...

बेहद संजिदा.....दर्द को आवाज देती हुई ...

संजय भास्‍कर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

Onkar said...

सुन्दर कविता

इमरान अंसारी said...

आप तो ईद का चाँद हो गईं हैं बड़ी मुश्किल से दर्शन होते हैं अरसे के बाद । मगर ख़ुशी है की कलम का जादू बरक़रार है …… खुबसूरत नज़्म |

कालीपद प्रसाद said...

बहुत खूब,सुंदर रचना !
latest post: क्षमा प्रार्थना (रुबैयाँ छन्द )
latest post कानून और दंड

sunita agarwal said...

wahh khuburat ..bhawo se labrej .. badhayi :)

Yashwant Yash said...

कल 22/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Kaushal Lal said...

हृदयस्पर्शी ,बहुत सुंदर रचना.....

expression said...

बहुत प्यारी रचना.....

कोमल सी..

अनु

राकेश कौशिक said...

हृदयस्पर्शी

wordy said...

hamesha hi man ko gudguda jate ho...!

wordy said...

main to kehta hoon..aapki kitab kab nikalegi?

dr.mahendrag said...

पारुल जी जब भावनाएं इतनी तीव्र हो जाती हैं तो मजबूरन निकल ही पड़ता है मुहं से -.

........ .मैं अपना वजूद उतार दूँ खुद से ही अजनवी हो कर,के मैं तुमको अपना प्यार दू ,मेरी एक ना पर तुम अपनी हाँ की रजा करते हो...
सुन्दर कृति

दिगम्बर नासवा said...

खुद को मिटा देना ... फिर प्यार गवाही देना तो नहीं ...
गहरा एहसास समेटे ....

जयकृष्ण राय तुषार said...

अच्छी सी कविता |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रोज़ रोज़ रफू करना ...चलो सुराख तो नहीं रहते । सुन्दर अभिव्यक्ति